वैजयंतीमाला का जन्मदिन आज: डांस से बदली हिंदी सिनेमा की नायिका की तस्वीर, शूटिंग के दौरान झेला हादसा

मुंबई, 13 जुलाई। हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की दिग्गज अभिनेत्री वैजयंतीमाला ने पर्दे पर अपनी खूबसूरती, अभिनय और शानदार नृत्य से अलग पहचान बनाई। हालांकि उनकी फिल्मी दुनिया जितनी चमकदार नजर आती थी, उसके पीछे उतनी ही मेहनत, जोखिम और संघर्ष भी छिपा था। अपनी आत्मकथा ‘बॉन्डिंग… ए मेमॉयर’ में उन्होंने शूटिंग के दौरान हुए कई ऐसे हादसों का जिक्र किया है, जो उस दौर में कलाकारों के सामने मौजूद चुनौतियों को दिखाते हैं। वैजयंतीमाला का जन्म 13 अगस्त 1933 को मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। कला और संस्कृति से जुड़े परिवार में जन्म लेने के कारण बचपन से ही उन्हें भरतनाट्यम की शिक्षा मिलने लगी। आगे चलकर यही शास्त्रीय नृत्य उनकी पहचान का अहम हिस्सा बना और उन्होंने इसे फिल्मों में अभिनय के साथ बेहद प्रभावी ढंग से पेश किया।

तमिल सिनेमा से शुरू हुआ सफर

वैजयंतीमाला ने वर्ष 1949 में तमिल फिल्म ‘वाझकाई’ से अभिनय की शुरुआत की। इसके बाद हिंदी सिनेमा में ‘बहार’ ने उनके लिए रास्ता खोला। कुछ ही समय में वह बड़ी स्टार बन गईं। ‘नागिन’, ‘देवदास’, ‘नई दिल्ली’, ‘नया दौर’, ‘मधुमती’, ‘साधना’, ‘गंगा जमना’, ‘संगम’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘आम्रपाली’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा की शीर्ष अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।

जब डांस बना उनकी सबसे बड़ी पहचान

वैजयंतीमाला ने भरतनाट्यम को फिल्मों के गीत और अभिनय का अहम हिस्सा बनाया। उनके नृत्य की शास्त्रीय शैली, भाव-भंगिमा और अभिनय ने उस दौर की अभिनेत्रियों की पारंपरिक छवि को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वजह रही कि हिंदी के साथ-साथ दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी उनकी अलग पहचान बनी।

डल झील में बाल-बाल बचीं

फिल्मों की शूटिंग के दौरान वैजयंतीमाला को कई मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनकी आत्मकथा में कश्मीर में तमिल फिल्म ‘थेन्निलावु’ की शूटिंग से जुड़ा एक खतरनाक हादसा भी दर्ज है। डल झील में एक दृश्य की शूटिंग के दौरान वह पानी में गिर गईं और लगभग डूबने की स्थिति में पहुंच गईं। हालात बिगड़ते देख कैमरामैन ने पानी में छलांग लगाई और उन्हें बाहर निकाला। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।

‘सूरज’ की शूटिंग में पैर में घुसी कील

वर्ष 1966 में रिलीज हुई फिल्म ‘सूरज’ की शूटिंग के दौरान भी उन्हें चोट लगी। वह लकड़ी से बने एक प्लेटफॉर्म पर डांस कर रही थीं। इसी दौरान लकड़ी से निकली एक कील उनके पैर में घुस गई। उन्हें तत्काल इलाज दिया गया। ये घटनाएं बताती हैं कि उस दौर में फिल्मों की शूटिंग आज की तुलना में कितनी जोखिम भरी थी। आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था, बॉडी डबल और विजुअल इफेक्ट्स की सीमित उपलब्धता के कारण कलाकारों को कई मुश्किल दृश्य खुद करने पड़ते थे।

विदेशों में भी किया भारतीय नृत्य का प्रदर्शन

फिल्मी करियर के साथ वैजयंतीमाला ने भरतनाट्यम से अपना जुड़ाव बनाए रखा। उन्होंने विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति दी। वर्ष 1969 में संयुक्त राष्ट्र की 20वीं वर्षगांठ के मानवाधिकार दिवस समारोह में प्रस्तुति देने वाली वह पहली भारतीय नृत्यांगना बनीं।

राजनीति में भी सक्रिय रहीं

वैजयंतीमाला ने बाद में राजनीति में भी कदम रखा। वह 1984 और 1989 में लोकसभा सदस्य रहीं। वर्ष 1993 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया।

पद्म श्री से पद्म विभूषण तक

वैजयंतीमाला को वर्ष 1968 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें फिल्म और नृत्य के क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। भारतीय सिनेमा और कला में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2024 में उन्हें पद्म विभूषण, देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान, से सम्मानित किया। राष्ट्रपति भवन में 9 मई 2024 को उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। वैजयंतीमाला का सफर सिर्फ एक सफल फिल्म अभिनेत्री का नहीं, बल्कि नृत्य, अभिनय और भारतीय संस्कृति को नई पहचान देने वाली कलाकार का भी है। उन्होंने अपने हुनर और मेहनत से हिंदी सिनेमा में ऐसी छाप छोड़ी, जिसे आज भी याद किया जाता है।

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