- मातृभाषा हिंदी, विज्ञान में स्नातक, बैंक की नौकरी और फिर गुजराती से हिंदी में अनुवाद कार्य जैसे विशाल व्यापकतावाले राजेंद्र निगम के साथ एक विशेष मुलाक़ात
[अलकेश पटेल] 14 सितंबर 2026 – हमारे आसपास कभी ऐसे नवरत्न मिल जाते हैं, जिनकी “परख” सामान्य लोगों को नहीं होती है | ऐसे रत्न अपना काम करते रहते हैं और समाज को व्यापक रूप से उनके बारे में तब ही मालूम होता है, जब उन्हें कोई पुरस्कार या सम्मान प्राप्त होता है | परंतु रिवोई के पास ऐसे रत्नों की पहचान की विशेष दृष्टि है और इसीलिए ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में हम यहाँ नियमित रूप से उनकी जानकारी प्रस्तुत करते रहते हैं |
आज ऐसी ही विविधता की व्यापक श्रेणी रखनेवाले एक रत्न को हम खोज लाए हैं | उनकी मातृभाषा हिंदी है, अभ्यास हिंदी माध्यम में किया है | स्नातक तक का अध्ययन विज्ञान के क्षेत्र में किया है | इकत्तीस वर्ष वित्तीय सेवा अर्थात बैंक की नौकरी में पूरे किए | लेकिन इन सब के बीच, उनके अंदर समाए लेखक और अनुवादक ने उन्हें बैंक से सेवा- निवृत्ति के बाद एक नई दिशा दी है और उसने उन्हें 77 वर्ष की उम्र में भी सक्रिय रखा है |
पुस्तकों का भी हिंदी अनुवाद कार्य
बात है श्री राजेंद्र निगम की | पिछले पाँच दशक से वे गुजरात में स्थाई हो गए हैं | गुजराती साहित्य क्षेत्र का एक छोटा वृत्त है, जो श्री राजेंद्र निगम से अच्छी तरह से परिचित है | क्योंकि उनकी पसंद की गुजराती रचनाओं का हिंदी अनुवाद वे करते रहे हैं | उनका अनुवाद कार्य केवल कहानी, उपन्यास, नाटकों तक सीमित नहीं है | जैन मीमांसा की पुस्तकों के अतिरिक्त उन्होंने उपन्यासों के भी हिंदी अनुवाद किए हैं | वर्ष 2021 में प्रकाशित, श्री अलकेश पटेल द्वारा गुजराती में संपादित पुस्तक, ‘पत्रकारत्व: विश्वसनीयतानो पड्कार’ का अनुवाद भी श्री निगम ने किया है | उस अनूदित पुस्तक का शीर्षक है, ‘पत्रकारिता: विश्वसनीयता की चुनौती’ |
कॉलेज काल से ही लेखन की प्रवृत्ति की शुरुआत
श्री निगम ने रिवोई को बताया कि बचपन से ही उन्हें पढ़ने का बहुत शौक रहा है, आज भी वह वैसा ही यथावत है | उनकी शिक्षा-दीक्षा गुजरात से सटे मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में हुई है | वहाँ से भौतिक, रसायन शास्त्र और गणित में वे स्नातक हुए | सत्तर के दशक में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कुछ महत्व के विषयों पर उनके लेख इंदौर के दो मुख्य अखबार ‘नईदुनिया और ‘स्वदेशी’ में प्रकाशित होते रहे | एक लेख तो पाठकों में इतना लोकप्रिय हुआ कि नई दुनिया में प्रकाशित हुए उस लेख का अन्य एक हिंदी पत्रिका ‘शताब्दी संदेश’ में उसका मुद्रण हुआ और साथ ही सूरत से गुजराती में प्रकाशित भूमि-पुत्र’ में भी उसका अनुवाद प्रकाशित किया गया |
अलबत्ता लेख तैयार करने के अलावा उन्होंने साहित्य की अन्य विधा जैसे कि कहानी या कविता आदि के सृजन में कोई प्रयोग नहीं किया | बाद में 31 वर्ष बैंक की नौकरी में रचे-पचे रहे और उस दौरान लेखन-कार्य पूरी तरह बंद रहा, लेकिन हाँ, पढ़ने का शौक यथावत् रहा |
करीब पाँच दशक पूर्व स्थानांरित होकर पहली बार जब गुजरात आए, तब गुजराती अखबार, पत्रिकाएँ पढ़ने को मिलती थीं| गुजराती अक्षर देखे तो ऐसा लगा कि हिंदी और गुजराती लिपि में कोई बहुत अंतर नहीं है | व्याकरण भी दोनों भाषाओं का लगभग समान लगा | बैंक के अधिकांश खातेदार गुजराती बोलते थे | बातचीत में गुजराती का उपयोग होता था | इसलिए गुजराती मनोयोग से पढ़ना शुरू कर दिया | तब 1980 के दशक में गुजराती लेखक चंद्रकांत बक्षी और विनोद भट्ट इनके पसंदीदा लेखक रहे थे और बाद में तो फिर साहित्यकारों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता रहा | बैंक की नौकरी से 2002 में स्वैच्छिक निवृत्ति ले ली | फिर अहमदाबाद में ही एक स्थानीय हिंदी अखबार (गुजरात वैभव) में फीचर संपादक के रूप में करीब चार वर्ष काम किया | अन्य अखबारों की तरह वहाँ भी अँग्रेजी से हिंदी और गुजराती से हिंदी का अनुवाद काम होता था | गुजराती से हिंदी के अनुवाद के काम में रस आने लगा और तब लगा कि केवल पूर्णरूपेण अनुवाद कार्य में प्रवृत्त रहा जा सकता है और फिर अखबार की फीचर संपादक की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया|
एक बार भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक और गांधीनगर-महुडी रोड पर स्थित अमरनाथ-धाम को विकसित करने वाले स्वर्गीय प्रह्लादभाई पटेल से संपर्क हुआ | उनकी पाँच गुजराती पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करने का अवसर मिला | पुस्तकों के अनुवाद उन्हें पसंद आए | अमरनाथ धाम की पृष्ठभूमि पर ‘बेड़ा पार करते अमरनाथ; नामक एक हिंदी फिल्म का निर्माण उन्होंने किया | उस फिल्म की अधिकांश शूटिंग गुजरात के गांधीनगर जिले में ही संपन्न हुई | इस फिल्म के सभी संवाद गुजराती में लिखे गए थे और उसका हिंदी अनुवाद करने का उन्हें मौका मिला |
इसके बाद तो अनुवाद के काम का सिलसिला शुरू हो गया | वलसाड के पत्रकार श्री संजय वोरा की ‘जैन-मीमांसा’ से संबंधित पुस्तक का अनुवाद किया | मुंबई के पत्रकार-साहित्यकार श्री सौरभ शाह के दो गुजराती उपन्यास का भी हिंदी अनुवाद किया | उनमें से एक उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘महाराज’ कुछ वर्ष पहले रिलीज हुई | साहित्य और साहित्य के अलावा अन्य विषयों पर अनुवाद की 14 पुस्तक अब तक प्रकाशित हुई हैं | अनुवाद-कार्य के अलावा वे इन दिनों भी कुछ पसंदीदा विषयों पर लेख लिखते हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं | लेख लिखने का सिलसिला कम है, लेकिन हर वर्ष अमूमन तीन- चार लेख प्रकाशित होते हैं |
गुजराती लेखकों की कहानियों की हिंदी पुस्तक
राजेंद्र जी ने रिवोई को गौरवमय जानकारी देते हुए बताया कि उन्होंने अभी तक 18 गुजराती साहित्यकारों की लगभग पचास कहानियों का हिंदी में अनुवाद किया है, जो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित विविध हिंदी भाषी राज्यों की विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं | उनके द्वारा अनूदित कुछ कहानियों और उनके कुछ लेखों का उड़िया, मराठी और कन्नड़ भाषाओं में अनुवाद हुआ है | उन 18 गुजराती रचनाकारों की 18 चुनिंदा अनूदित कहानियों का संग्रह प्रकाशनाधीन है |
किन-किन लेखकों की कहानियों का अनुवाद हुआ ?
श्री निगम जी ने बताया कि उन सर्जकों में शामिल हैं, सुश्री अलका त्रिवेदी, उमा परमार, कंदर्प देसाई, डॉक्टर कालिंदी परीख, गिरीमा घारेखान, जिज्ञा वोरा, निमिषा मजमुन्दार, नेहा अनीश गाँधी, प्रज्ञा पटेल, पंकज हर्षद भाई नाडिया, बकुल दवे, मावजी महेश्वरी, यशवंत ठक्कर, रमण मेकवान, रेणुका दवे, रुश्वी टेलर, लता हिराणी तथा हर्षित राठौर | ये कहानियाँ विभिन्न हिंदी पत्रिकाओं में या उनके दिवाली अंकों में प्रकाशित हुई हैं और अब उनमें से कुछ चयनित कहानियों का संग्रह पुस्तकाकार रूप में आ रहा है |
अब कविता के क्षेत्र में भी
श्री राजेंद्र निगम ने गुजराती भाषा को अच्छी तरह आत्मसात् किया | उन्होंने गुजराती कविताओं का भी हिंदी अनुवाद किया है | हाल ही में ‘नया ज्ञानोदय’ पत्रिका के अगस्त-सितंबर 2026 के अंक में पाँच गुजराती कवि- बृजेश पांचाल, भावेश रावल, सागर चोटालिया, अमित सिंह गामी और पीयूष चावड़ा की उनके द्वारा अनूदित कविताएँ प्रकाशित हुई हैं |
इन कर्मठ व्यक्ति ने गुजराती रचनाओं का हिंदी अनुवाद किसी आर्थिक उद्देश्य के लिए नहीं किया है | उनसे पूछा कि वे ये सब काम किस मंतव्य से कर रहे हैं, तब श्री राजेंद्र भाई निगम ने जो बताया, उससे प्रत्येक साहित्य-प्रेमी के मन में उनके लिए अहोभाव उत्पन्न होगा | उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य रहा है कि इस अनुवाद-कार्य के द्वारा जो भी श्रेष्ठ गुजराती साहित्य का सृजन हो, उससे हिंदी का अधिकांश पाठक-वर्ग भी लाभान्वित हो |


