लखनऊ, 27 अगस्त। योग को आमतौर पर शरीर को लचीला और सक्रिय बनाए रखने वाले अभ्यास के रूप में जाना जाता है, लेकिन योग परंपरा में कई ऐसी मुद्राएं और बंध भी बताए गए हैं, जिनका अभ्यास ध्यान, मानसिक स्थिरता और एकाग्रता के लिए किया जाता है। ज्ञान मुद्रा से लेकर शाम्भवी मुद्रा तक, इन तकनीकों का इस्तेमाल ध्यान और प्राणायाम के दौरान किया जाता है। हालांकि, कुछ अभ्यास शुरुआती लोगों के लिए उपयुक्त नहीं होते और उन्हें प्रशिक्षित योग शिक्षक की देखरेख में सीखना बेहतर माना जाता है।
ज्ञान मुद्रा से शुरू करें अभ्यास
ज्ञान मुद्रा सबसे सरल और लोकप्रिय हस्त मुद्राओं में शामिल है। इसे करने के लिए सुखासन, पद्मासन या किसी आरामदायक स्थिति में रीढ़ सीधी करके बैठें। दोनों हाथों को घुटनों पर रखें और तर्जनी उंगली के सिरे को अंगूठे के सिरे से हल्के से स्पर्श कराएं। बाकी उंगलियों को सीधा और तनावमुक्त रखें। इस मुद्रा का अभ्यास आमतौर पर ध्यान के दौरान किया जाता है। योग परंपरा में इसे मन को शांत रखने और एकाग्रता बढ़ाने से जोड़ा जाता है।
चिन मुद्रा में सांस पर करें ध्यान
चिन मुद्रा में भी अंगूठे और तर्जनी उंगली के सिरों को हल्के से मिलाया जाता है। इसमें हथेलियां ऊपर की ओर रखी जाती हैं। आंखें बंद करके सहज रूप से सांसों पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। इसे प्राणायाम और ध्यान के दौरान किया जाता है।
महाबंध है उन्नत योग अभ्यास
महाबंध को योग में तीन प्रमुख बंधों-मूलबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बंध-के संयुक्त अभ्यास के रूप में बताया जाता है। इसमें सांस छोड़ने के बाद अपनी क्षमता के अनुसार श्वास रोककर निर्धारित क्रम में बंध लगाए जाते हैं। यह अपेक्षाकृत उन्नत तकनीक है। इसलिए इसे बिना जानकारी के करने के बजाय किसी प्रशिक्षित योग शिक्षक से सही विधि सीखना बेहतर है।
उड्डियान बंध में पेट को अंदर खींचने का अभ्यास
उड्डियान बंध में सांस पूरी तरह बाहर निकालने के बाद पेट को अंदर और ऊपर की ओर खींचने का अभ्यास किया जाता है। हठ योग की परंपरा में इसे महत्वपूर्ण आंतरिक अभ्यास माना गया है। इसका अभ्यास खाली पेट और सही तकनीक के साथ करना चाहिए। शुरुआती लोगों को इसे सीखते समय जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए और अपनी क्षमता से अधिक देर तक सांस रोकने से बचना चाहिए।
जालंधर बंध में ठोड़ी को छाती की ओर लाते हैं
जालंधर बंध में श्वास रोकते हुए ठोड़ी को धीरे-धीरे छाती की ओर लाने का अभ्यास किया जाता है। इसे भी योग की उन्नत तकनीकों में गिना जाता है। गलत तरीके से या लंबे समय तक सांस रोककर इसका अभ्यास करना उचित नहीं है। इसे किसी प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ से सीखना बेहतर है।
अगोचरी मुद्रा से एकाग्रता पर ध्यान
अगोचरी मुद्रा, जिसे नासाग्र दृष्टि भी कहा जाता है, में आंखों की दृष्टि को नाक की नोक पर टिकाने का अभ्यास किया जाता है। शुरुआत में कुछ सेकंड तक ही इसका अभ्यास करना चाहिए और आंखों पर अनावश्यक दबाव नहीं डालना चाहिए। इसके बाद आंखों को बंद करके आराम दिया जा सकता है। योग परंपरा में इस अभ्यास को मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने से जोड़ा जाता है।
षण्मुखी मुद्रा में ध्यान भीतर की ओर ले जाने का प्रयास
षण्मुखी मुद्रा में हाथों की उंगलियों की मदद से आंख, कान, नाक और मुंह के आसपास के इंद्रिय-द्वारों को हल्के से बंद किया जाता है। इसका उद्देश्य बाहरी उत्तेजनाओं से ध्यान हटाकर सांस और भीतर की ध्वनियों पर ध्यान केंद्रित करना है।इस अभ्यास में दबाव डालने के बजाय बेहद सहज तरीके से इंद्रियों को भीतर की ओर केंद्रित करने का प्रयास किया जाता है।
आकाशी मुद्रा का ध्यान में किया जाता है अभ्यास
आकाशी मुद्रा में मध्यमा उंगली और अंगूठे के सिरों को हल्के से मिलाया जाता है। इसे ध्यान के साथ किया जा सकता है। योग परंपरा में इसे मानसिक शांति और एकाग्रता से जोड़ा जाता है।
शाम्भवी मुद्रा में भौंहों के बीच ध्यान
शाम्भवी मुद्रा में ध्यान को दोनों भौंहों के बीच के क्षेत्र पर सहजता से केंद्रित किया जाता है। इसे करते समय आंखों को जबरदस्ती ऊपर उठाने या उन पर दबाव डालने से बचना चाहिए। ध्यान और मानसिक स्थिरता से जुड़े अभ्यासों में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
ध्यान रखें: योग की सरल मुद्राएं आमतौर पर आसानी से सीखी जा सकती हैं, लेकिन महाबंध, उड्डियान बंध और जालंधर बंध जैसे उन्नत अभ्यास सही तकनीक के साथ ही करने चाहिए। किसी भी अभ्यास के दौरान असहजता, चक्कर या सांस लेने में परेशानी महसूस हो तो अभ्यास रोक दें और विशेषज्ञ से सलाह लें।


