नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इस श्लोक के जरिए उन्होंने बताया कि किसी व्यक्ति को वास्तव में श्रेष्ठ बनाने के लिए केवल ज्ञान, वाक्पटुता और कार्यकुशलता ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उसके व्यक्तित्व में शील और सदाचार का होना भी जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत श्लोक साझा करते हुए लिखा-
“ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः।
एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥”
इसका भावार्थ है कि जो व्यक्ति ज्ञानवान, वाक्पटु और अपने कार्यों में निपुण होने के साथ-साथ शील एवं सदाचार से युक्त होता है, वही वास्तव में श्रेष्ठ कहलाता है।
‘समराङ्गणसूत्रधार’ से लिया गया है श्लोक
पीएम मोदी की ओर से साझा किया गया यह श्लोक महाराजा भोज द्वारा रचित प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ के 44वें अध्याय का 16वां श्लोक बताया गया है। श्लोक में व्यक्ति के जीवन में अच्छे चरित्र और सदाचार के महत्व को प्रमुखता दी गई है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि कोई व्यक्ति कितना भी विद्वान क्यों न हो, वह कितना ही अच्छा वक्ता हो या अपने काम में कितना भी दक्ष और निष्ठावान हो, लेकिन अगर उसके आचरण में शील और सदाचार नहीं है तो उसकी श्रेष्ठता अधूरी मानी जाती है।
केवल ज्ञान और सफलता ही पर्याप्त नहीं
इस सुभाषित का संदेश है कि समाज में ज्ञान को हमेशा महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, लेकिन ज्ञान के साथ अच्छा चरित्र होना भी उतना ही आवश्यक है। कोई व्यक्ति अपनी वाणी और प्रभावशाली बातों से दूसरों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन यदि उसके आचरण में ईमानदारी और नैतिकता नहीं है तो उसकी वाक्पटुता का सकारात्मक महत्व कम हो जाता है। इसी तरह किसी कार्य में निपुणता और पूरी लगन से काम करना व्यक्ति की बड़ी खूबी है। लेकिन यदि पेशेवर सफलता के साथ नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण का अभाव हो तो ऐसी सफलता को भी पूर्ण नहीं माना जा सकता।
चरित्र को बताया गया श्रेष्ठता का आधार
श्लोक का मूल संदेश यही है कि ज्ञान, वाणी और कर्म-कौशल तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ अच्छा चरित्र और सदाचार जुड़ा हो। व्यक्ति की वास्तविक श्रेष्ठता केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके आचरण और नैतिक मूल्यों से भी तय होती है।


