नई दिल्ली, 6 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को अपनी दैनिक परंपरा जारी रखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इस बार उन्होंने मातृभूमि की महिमा का वर्णन करते हुए देशवासियों से राष्ट्र सेवा का संदेश दिया।
संस्कृत श्लोक के जरिए दिया राष्ट्रसेवा का संदेश
प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा-
“विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्।
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥”
इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि सभी प्रकार की श्रेष्ठ वनस्पतियों और औषधियों को जन्म देने वाली, धर्म के आधार पर स्थिर और कल्याणकारी पृथ्वी माता की हम सदैव सेवा करें। यह मातृभूमि विद्या, शौर्य, सत्य और स्नेह जैसे सद्गुणों से संपन्न होकर सभी के लिए सुख और समृद्धि का आधार बने।
बुधवार को आत्मिक विकास पर साझा किया था सुभाषित
इससे पहले बुधवार को प्रधानमंत्री ने आत्मिक विकास और राष्ट्र निर्माण पर आधारित संदेश साझा किया था। उन्होंने लिखा था कि आत्मिक विकास व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना का संचार करता है, जिससे युवा शक्ति देश को हर क्षेत्र में आगे बढ़ा रही है।
इसके साथ उन्होंने यह संस्कृत श्लोक साझा किया था-
“आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती।
तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते।”
इसका हिंदी अर्थ है कि स्वयं का उत्थान और निरंतर प्रगति ही जीवन की सच्ची नीति है। इसी उद्देश्य के साथ गुणी और विद्वान लोग अपने ज्ञान, कौशल और प्रभाव का विस्तार कर समाज में सकारात्मक योगदान देते हैं।
मंगलवार को ज्ञान और साधना का दिया था संदेश
मंगलवार को प्रधानमंत्री ने युवाओं को निरंतर प्रयास और साधना के लिए प्रेरित करते हुए लिखा था कि लगातार प्रयास से प्रतिभा निखरती है और आज के युवा इन्हीं गुणों के बल पर दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं।
इसके साथ उन्होंने भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक साझा किया-
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥”
इसका अर्थ है कि इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र तत्व नहीं है। साधना और कर्मयोग से शुद्ध अंतःकरण वाला व्यक्ति समय आने पर उस परम ज्ञान का अनुभव स्वयं अपने भीतर करता है।

