कोलकाता, 5 मई। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भाजपा को 207 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद कार्यवाहक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अड़ियल रुख ने राज्य को एक ऐसे संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जो भारतीय लोकतंत्र में विरले ही देखने को मिलता है।
दरअसल, चुनाव हारने के बाद मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता बनर्जी ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा, “मेरे इस्तीफे का तो सवाल ही नहीं उठता, हम जनता के जनादेश से नहीं बल्कि साजिश से हारे हैं। हम हारे नहीं, हमें हराया गया है। भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर काम किया और पूरे चुनाव में गड़बड़ी हुई। यह चुनाव जैसे भाजपा और चुनाव आयोग के बीच ‘सांठगांठ’ जैसा था।”
क्या कहता है कानून?
- भारतीय संविधान के अनुसार, कोई भी मुख्यमंत्री तब तक ही पद पर रह सकता है, जब तक उसे विधानसभा में बहुमत प्राप्त हो।
- अनुच्छेद 164 (2) : इसके तहत मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। चुनाव हारने का सीधा मतलब है कि सदन में मुख्यमंत्री का विश्वास खत्म हो गया है।
- राज्यपाल की शक्ति : संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और मुख्यमंत्री ‘राज्यपाल की इच्छा’ तक पद पर बने रहते हैं। हालांकि, बहुमत खोने के बाद यह रास्ता भी तकनीकी रूप से खत्म हो जाता है।
राज्यपाल के पास ये हैं विकल्प
- बर्खास्तगी : यदि चुनाव आयोग की तरफ से आधिकारिक रूप से नए सदन के गठन की अधिसूचना जारी कर दी जाती है और नई पार्टी बहुमत का दावा पेश करती है तो राज्यपाल वर्तमान मुख्यमंत्री को पद से बर्खास्त कर सकते हैं।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) : यदि मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं और राज्य में नई सरकार बनने में रुकावट पैदा हो रही है, तो राज्यपाल इसे ‘संवैधानिक मशीनरी की विफलता’ मानकर केंद्र को राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं।
- फ्लोर टेस्ट का निर्देश : राज्यपाल नई विधानसभा का सत्र बुलाकर ममता बनर्जी को सदन में बहुमत साबित करने को कह सकते हैं। हालांकि, चुनाव में स्पष्ट हार के बाद इसकी संभावना कम होती है।
सत्ता का यह हठ बंगाल के लिए कितना भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी का यह कदम दरअसल एक ‘कानूनी और राजनीतिक ढाल’ तैयार करने की कोशिश है। उनका कहना है, “ममता बनर्जी इस मामले को अदालत में ले जाना चाहती हैं। उनका तर्क है कि यदि चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध है तो इस्तीफा देना हार स्वीकार करने जैसा होगा। लेकिन संवैधानिक रूप से, नंबर गेम उनके खिलाफ है। बिना बहुमत के कोई भी व्यक्ति एक दिन भी ‘कार्यकारी मुख्यमंत्री’ से आगे पद पर नहीं रह सकता।”
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क्या होगा असका असर?
- इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि नई सरकार के गठन में देरी से राज्य का प्रशासनिक काम रुक सकता है। कार्यवाहक सरकार की गैर-मौजूदगी में राज्य में हिंसा या अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है।
- यह मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है, जहां अदालत को यह तय करना होगा कि ‘जनादेश बनाम प्रक्रियात्मक त्रुटि’ के मामले में तत्काल क्या कदम उठाए जाएं।
- कुल मिलाकर देखें तो पश्चिम बंगाल इस समय एक ऐसी स्थिति में है, जहां लोकतंत्र की ‘परंपरा’ और ‘कानून की किताब’ के बीच टकराव हो रहा है। यदि अगले 24 से 48 घंटों में ममता बनर्जी राजभवन जाकर इस्तीफा नहीं सौंपती तो केंद्र सरकार की हस्तक्षेप की संभावना प्रबल हो जाएगी।
