नई दिल्ली, 30 मई। हर वर्ष 31 मई को विश्व धूम्रपान निषेध दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को तंबाकू और धूम्रपान से होने वाले गंभीर स्वास्थ्य खतरों के प्रति जागरूक करना है। धूम्रपान आज विश्वभर में लाखों लोगों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। यह न केवल फेफड़ों, हृदय और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचाता है बल्कि परिवार और समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। इस दिवस के माध्यम से लोगों को तंबाकू छोड़ने, स्वस्थ जीवनशैली अपनाने और आने वाली पीढ़ियों को इस घातक लत से बचाने का संदेश दिया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, तंबाकू का सेवन कैंसर, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और स्ट्रोक सहित कई दीर्घकालिक बीमारियों का एक प्रमुख जोखिम कारक है। यह भारत में मृत्यु और बीमारी के प्रमुख कारणों में से एक है और प्रतिवर्ष लगभग 13 लाख मौतों का कारण बनता है। भारत तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और उत्पादक भी है। देश में विभिन्न प्रकार के तंबाकू उत्पाद बहुत कम कीमतों पर उपलब्ध हैं।
ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे इंडिया 2016-17 के अनुसार, भारत में लगभग 26.7 करोड़ वयस्क तंबाकू का सेवन करते हैं। भारत में तंबाकू के सेवन का सबसे प्रचलित रूप धुआं रहित तंबाकू है और आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद खैनी, गुटखा, तंबाकू युक्त पान और जर्दा हैं। धूम्रपान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तंबाकू के रूपों में बीड़ी, सिगरेट और हुक्का शामिल हैं।
वैश्विक स्तर पर, तंबाकू का सेवन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। यह न केवल जीवन की हानि का कारण बनता है बल्कि इसके भारी सामाजिक और आर्थिक परिणाम भी होते हैं। भारत में वर्ष 2017-18 में 35 वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए तंबाकू के सेवन से होने वाली सभी बीमारियों की कुल आर्थिक लागत 177,341 करोड़ रुपये (27.5 अरब अमेरिकी डॉलर) थी।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, विश्वभर में 13-15 वर्ष की आयु के कम से कम 4 करोड़ बच्चे तंबाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। युवाओं में ई-सिगरेट और निकोटीन पाउच का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस (31 मई) से पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया भर की सरकारों से आग्रह किया है कि वे नई पीढ़ी को तंबाकू और निकोटीन उत्पादों की लत से बचाएं।
तंबाकू के सेवन से हर साल दुनिया में 70 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। यह विश्व स्तर पर रोकी जा सकने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक है और हृदय रोग, श्वसन संबंधी बीमारियों और 20 से अधिक विभिन्न प्रकार के कैंसर से जुड़ा हुआ है। डब्ल्यूएचओ दुनिया भर में 1 अरब से अधिक तंबाकू, ई-सिगरेट और निकोटीन पाउच उपयोगकर्ताओं को 31 मई को लत से छुटकारा पाने की दिशा में पहला कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
एक अध्ययन के मुताबिक, तंबाकू के सेवन से होने वाली आर्थिक लागत भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 1.04 फीसदी है, जबकि पिछले वर्ष तंबाकू पर प्राप्त उत्पाद शुल्क राजस्व इसकी आर्थिक लागत का केवल 12.2 फीसदी था। प्रत्यक्ष चिकित्सा लागत अकेले कुल स्वास्थ्य व्यय का 5.3 फीसदी है। तंबाकू के सेवन के कारण देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर पड़ने वाली भारी लागत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर दबाव डाल सकती है और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है, इसलिए भारत में तंबाकू नियंत्रण प्रयासों को बड़े पैमाने पर बढ़ाना आवश्यक है।
धूम्रपान केवल एक बुरी आदत नहीं बल्कि एक ऐसी लत है जो धीरे-धीरे व्यक्ति के शरीर को अंदर से खोखला कर देती है। तंबाकू में मौजूद निकोटीन व्यक्ति को इसकी आदत डाल देता है, जबकि इसके धुएं में उपस्थित हजारों हानिकारक रसायन फेफड़ों, हृदय, मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। धूम्रपान से फेफड़ों का कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक, श्वसन संबंधी बीमारियां और कई अन्य गंभीर रोग होने का खतरा बढ़ जाता है।
तंबाकू का सेवन परिवारों को गरीब बनाता है, उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है, असमानताओं को बढ़ाता है और समाज एवं अर्थव्यवस्था दोनों को हानि पहुंचाता है। ये कारक सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने के वैश्विक प्रयासों को प्रभावित करते हैं, जिनका उद्देश्य अधिक न्यायसंगत, स्वस्थ और टिकाऊ विश्व का निर्माण करना है। तंबाकू से प्राप्त राजस्व सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों और टिकाऊ आर्थिक विकास रणनीति के बिल्कुल विपरीत है।
