तस्लीमा नसरीन ने बांग्लादेश सरकार पर साधा निशाना, बोलीं- ‘मदरसा जिहादियों के पनपने की जगह…’

कोलकाता, 2 अगस्त। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने समान नागरिक संहिता (UCC) के प्रति अपना समर्थन स्पष्ट करते हुए कहा कि समान अधिकारों की लड़ाई में सभी के लिए समान कानून होना ही सभ्यता की पहली शर्त है।

‘मैं पिछले 40 वर्षों से समान नागरिक संहिता के लिए संघर्ष कर रही हूं’

लगभग 19 वर्षों बाद कोलकाता लौटीं तस्लीमा नसरीन ने बांग्ला अकादमी में रविवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘मैं पिछले 40 वर्षों से समान नागरिक संहिता के लिए संघर्ष कर रही हूं। इस उपमहाद्वीप के देशों – जैसे बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान को समान नागरिक संहिता की आवश्यकता है। किसी भी सभ्य राष्ट्र में यूसीसी होता ही है। मुस्लिम महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है।’

उन्होंने कहा, ‘बांग्लादेश में हिन्दू महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं हैं। वहां हिन्दू पुरुष बहुविवाह करते हैं और हिन्दू महिलाओं के पास तलाक लेने की स्वतंत्रता नहीं है। हालांकि भारतीय हिन्दू कानून (1956 का) समान अधिकार प्रदान करता है, लेकिन बांग्लादेश में हिन्दू महिलाओं को ऐसी स्वतंत्रता दिलाने के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है।’

‘सभी मदरसों को धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में बदल दिया जाना चाहिए’

मदरसों के बारे में पूछे गए एक सवाल पर तस्लीमा ने कहा, ‘बांग्लादेश के मदरसों के बारे में मैं जितना जानती हूं, उसके आधार पर उन्हें नहीं होना चाहिए। वे जिहादियों के पनपने की जगह हैं। वहां बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और शोषण की घटनाएं होती हैं और इमाम व शिक्षक अक्सर पकड़े जाते हैं। मदरसों से पास होने वाले छात्र उत्पादक करियर नहीं चुन पाते। वे अक्सर भिक्षावृत्ति का सहारा लेते हैं। इसके बजाय, सभी मदरसों को धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में बदल दिया जाना चाहिए।’

तस्लीमा ने कहा कि बांग्लादेश सरकार को मदरसों और मस्जिदों पर नियंत्रण रखना चाहिए। उन्होंने बात जोड़ते हुए कहा, ‘सरकार को खुद धर्म का प्रचार नहीं करना चाहिए। सरकार का धर्म से कोई संबंध नहीं होना चाहिए।’

वहीं रवींद्र सदन में आयोजित स्वागत समारोह में तस्लीमा नसरीन ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा, ‘कृतज्ञता अधीनता का कोई समझौता नहीं है।’ उल्लेखनीय है कि वाम मोर्चा के शासनकाल के दौरान लेखिका को कोलकाता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और बाद की तृणमूल सरकार ने भी उन्हें वापस लाने की कोई पहल नहीं की। इसके विपरीत, भाजपा सरकार के सत्ता में आने के तीन महीने के भीतर ही तस्लीमा कोलकाता लौट आईं।

सीएम शुभेंदु अधिकारी ने तस्लीमा का किया स्वागत

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से मंच पर खड़े होकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का संकल्प लिया और कहा, ‘पश्चिम बंगाल के प्रशासन में हुए बदलावों को देखते हुए आपको अक्सर यहां आना चाहिए। एक सुरक्षित पश्चिम बंगाल में आपकी सुरक्षा सुनिश्चित करना मुख्यमंत्री और पुलिस की जिम्मेदारी है। यह केवल चेहरों का बदलाव नहीं वरन पूरी व्यवस्था ही बदल गई है।’

जब एक पत्रकार ने तस्लीमा से तीनों सरकारों के बीच अंतर के बारे में पूछा तो लेखिका ने उत्तर दिया, ‘एक सरकार ने मुझे निकाल दिया, दूसरी ने मुझे वापस नहीं आने दिया, वहीं एक और सरकार ने मुझे वापस आने की अनुमति दी है।’

लेखिका ने स्पष्ट किया कि वह प्रगतिशील मुसलमानों के संगठन ‘सेक्युलर मिशन ट्रस्ट’ के निमंत्रण पर आई हैं और उन्हें दी गई सुरक्षा के पीछे कोई राजनीतिक मकसद नहीं है। उन्हें चाहे कोई भी सरकार सुरक्षा प्रदान करे, वह अपने आदर्शों और व्यक्तिगत मान्यताओं पर हमेशा अडिग रहेंगी।

शेख हसीना की सरकार गिराने वाले आंदोलन के पीछे जिहादियों की भूमिका थी

लेखिका ने बांग्लादेश में हाल ही में हुए राजनीतिक उलटफेर और छात्र आंदोलन को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उनके विचार में कोटा सुधार की मांग करने वाला छात्र आंदोलन शुरू में उचित लग रहा था, लेकिन बाद में यह एक अलग दिशा में मुड़ गया। तस्लीमा ने टिप्पणी की, ‘बांग्लादेश के उस छात्र आंदोलन ने हमें मूर्ख बनाया।’ उनका दावा है कि सरकार को गिराने वाले आंदोलन के पीछे जिहादियों की भूमिका थी और बाद में उन्होंने देश पर नियंत्रण कर लिया।

अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला अलोकतांत्रिक

तस्लीमा ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की कड़ी आलोचना की। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की विभिन्न नीतियों की आलोचना करने के बावजूद, तस्लीमा का मानना ​​है कि किसी राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाना या उसे देश से बाहर निकालना कभी भी लोकतांत्रिक कदम नहीं है।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे लगातार अत्याचारों की कड़ी निंदा

लेखिका ने बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे लगातार अत्याचारों की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिलाया कि जियाउर रहमान, इरशाद और शेख हसीना के दौर से लेकर मौजूदा यूनुस प्रशासन तक – हर शासनकाल में हिन्दुओं को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। हालांकि हाल के दिनों में इसकी तीव्रता बढ़ गई है। तस्लीमा ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी को लेकर भी अपनी आवाज उठाई।

जमात-ए-इस्लामी का उभार बेहद खतरनाक

वह बांग्लादेश में मुख्य विपक्षी दल के रूप में जमात-ए-इस्लामी के उभार को बेहद खतरनाक मानती हैं। तस्लीमा के अनुसार, यदि वे सत्ता में आते हैं, तो 7वीं शताब्दी का शरिया कानून लागू कर दिया जाएगा, जो महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए तबाही लेकर आएगा।

कोलकाता पुस्तक मेले में भाग लेने की तीव्र इच्छा व्यक्त की

तस्लीमा ने अंत में भविष्य में कोलकाता पुस्तक मेले में भाग लेने की तीव्र इच्छा व्यक्त की। उन्होंने उल्लेख किया कि यदि राज्य सरकार सुरक्षा प्रदान करती है तो वह मेले में उसी तरह शामिल होंगी, जैसे पहले हुआ करती थीं। दोनों देशों के बीच संबंधों के बारे में उन्होंने उम्मीद जताई कि मुक्ति संग्राम का समर्थन करने वाले सही सोच के लोग हमेशा भारत और बांग्लादेश के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने की वकालत करेंगे।

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