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I-PAC केस में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी : सीएम ममता बनर्जी ने जांच में दिया दखल, लोकतंत्र को खतरे में डाला’

I-PAC केस में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी : सीएम ममता बनर्जी ने जांच में दिया दखल, लोकतंत्र को खतरे में डाला’

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नई दिल्ली, 22 अप्रैल। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी की उस हरकत पर कड़ी नाराजगी जताई, जिसमें वह इसी वर्ष जनवरी में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के दौरान आई-पैक (I-PAC) के को-फाउंडर प्रतीक जैन के घर पहुंच गई थीं। कोर्ट ने कहा कि उनका इस तरह का कदम लोकतंत्र को खतरे में डाल सकता है।

जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ईडी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) से कराने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, ‘किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री जांच के बीच में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, इससे लोकतंत्र खतरे में पड़ता है। बाद में यह कहना कि इसे केंद्र बनाम राज्य का विवाद न बनाया जाए, स्वीकार्य नहीं है। यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा उठाया गया कदम था, जो संयोग से एक राज्य की मुख्यमंत्री हैं. इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर खतरा उत्पन्न होता है।’

दरअसल, यह विवाद जनवरी में ईडी द्वारा प्रतीक जैन के आवास पर कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की गई छापेमारी से जुड़ा है। केंद्रीय एजेंसी का आरोप है कि ममता बनर्जी जांच के दौरान मौके पर पहुंचीं और अहम दस्तावेज अपने साथ लेकर चली गईं, जिससे यह मामला बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक विशेषज्ञों – एचएम सीरवई और बीआर आंबेडकर ने शायद ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी, जहां कोई मौजूदा मुख्यमंत्री किसी जांच में हस्तक्षेप करे।

सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि ईडी एक एजेंसी के रूप में मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि एजेंसी कोई अलग न्यायिक इकाई (Juristic Entity) नहीं है और उसे जांच करने का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है।

ममता की वकील ने दिए ये तर्क दिए

वहीं, ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि कोर्ट का रिट ज्यूरिस्डिक्शन ‘न्यायिक व्यक्तियों’ तक सीमित होता है और मौलिक अधिकार नागरिकों को राज्य (सरकार) की अवैध काररवाई से बचाने के लिए होते हैं न कि राज्य को अपने ही अधिकारों के उल्लंघन का दावा करने के लिए।

मेनका गुरुस्वामी ने यह भी तर्क दिया कि केंद्र सरकार स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों को बदलने की कोशिश कर रही है और उन्होंने केशवानंद भारती मामला सहित कई उदाहरणों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि राज्य एक साथ ‘संवैधानिक अपराधी और पीड़ित’ नहीं हो सकता और रिट ज्यूरिस्डिक्शन मूलतः राज्य के खिलाफ ही विकसित हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बार-बार इस बात पर चिंता जताई कि किसी मौजूदा मुख्यमंत्री द्वारा चल रही जांच में हस्तक्षेप करने के क्या निहितार्थ हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि यह मामला संस्थागत सीमाओं और कानून के शासन से जुड़े गंभीर सवाल उठाता है।

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