RSS प्रमुख मोहन भागवत बोले- जब तक असमानता बनी रहेगी, तब तक जारी रहेगा आरक्षण
मुंबई, 6 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जाति-आधारित आरक्षण को लेकर फिर शुरू हुई बहस और सड़कों पर हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच गुरुवार को यहां कहा कि आरक्षण का मकसद सामाजिक समानता लाना था और जब तक असमानता बनी रहेगी, तब तक यह जारी रहेगा।
NMACC में 2,000 ‘जेन Z’ व ‘जेन अल्फा‘ युवाओं को संबोधन
मुंबई के नीता-मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) में 2,000 ‘जेन Z’ और ‘जेन अल्फा’ युवाओं की मौजूदगी में आईआईएमयूएन के फाउंडर ऋषभ शाह से बातचीत के दौरान भागवत ने हालांकि यह भी कहा कि जिन लोगों को आरक्षण का फायदा मिला है, उन्हें उदारता दिखाते हुए ये फायदे छोड़ देने चाहिए। आरक्षण का फायदा उठाने वाले कुछ लोगों के मन में ऐसी भावनाएं आ रही हैं। यह कार्यक्रम INDIA’S INTERNATIONAL MOVEMENT TO UNITE NATIONS (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ का जश्न था और इसका विषय था – ‘दुनिया को एकजुट करने में युवाओं की भूमिका : भारतीय तरीका।’

ऋषभ शाह ने डॉ. भागवत से वे सवाल पूछे, जो युवाओं और स्कूली बच्चों से लिए गए थे। शिक्षा और रोजगार में आरक्षण कम करने के समय के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए, RSS प्रमुख भागवत ने कहा कि इस मुद्दे को डॉ. बी.आर. आंबेडकर के नजरिए से देखा जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक सामाजिक भेदभाव बना रहेगा, तब तक आरक्षण जरूरी रहेगा।
उल्लेखनीय है कि नीट-यूजी पेपर लीक को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध-प्रदर्शनों के बीच आरक्षण एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। कुछ लोगों का मानना है कि नीट की तैयारी करने वाले छात्रों में से कुछ की आत्महत्याओं की वजह शिक्षा में आरक्षण से पैदा हुआ अतिरिक्त दबाव था।
आरक्षण को डॉ. आंबेडकर की नजरिए से देखें तो कोई समस्या नहीं
शाह द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या आरक्षण अनिश्चित काल तक जारी रहना चाहिए या वापस ले लिया जाना चाहिए, डॉ. भागवत ने सीधे हां या ना में जवाब देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘मैं आपको सीधे तौर पर जवाब नहीं दूंगा। मैं आपसे कहूंगा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने आरक्षण के बारे में क्या सोचा था। अगर हम ईमानदारी से उनकी सलाह का पालन करें, तो कोई समस्या नहीं है। आरक्षण सामाजिक कारणों से मौजूद है। जब तक सामाजिक भेदभाव मौजूद है, आरक्षण जारी रहेगा।’
जो लोग आरक्षण का लाभ ले चुके हैं, उन्हें इसे छोड़ने की उदारता दिखानी चाहिए
भागवत ने यह भी कहा कि जो लोग पहले ही आरक्षण से लाभान्वित हो चुके हैं और सामाजिक और आर्थिक प्रगति हासिल कर चुके हैं, उन्हें इतना उदार होना चाहिए कि वे अपने समुदाय के अन्य लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए आरक्षण से हट जाएं। उन्होंने कहा, ‘जिन लोगों को आरक्षण मिला है और जिनकी स्थिति में सुधार हुआ है, उन्हें इसे छोड़ने की उदारता दिखानी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि आरक्षण लाभार्थियों के कुछ वर्गों में ऐसी सोच पहले से ही उभर रही है।
सब-कैटेगराइजेशन का समर्थन किया
आरएसएस प्रमुख के अनुसार आरक्षित समुदायों के भीतर वर्गीकरण की मांग इसलिए उठी है कि यह बात अब ज्यादा समझी जा रही है कि आरक्षण का फायदा सभी तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर बात की है। उन्होंने कहा, ‘आरक्षण पाने वालों में एक सोच यह है कि यह हमारी बेहतरी के लिए है। यह कोई स्थायी उपाय नहीं है। हमें इसका फायदा उठाना चाहिए, खुद को बेहतर बनाना चाहिए और इसे उन लोगों के लिए भी उपयोगी बनाना चाहिए, जिन्हें अब तक इसका लाभ नहीं मिला है। इस सोच को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।’
आरक्षण लागू करने का काम राजनीतिक सोच से अलग हो
उन्होंने कहा कि आरक्षण लागू करने का काम राजनीतिक सोच से अलग होना चाहिए। यदि कल्याणकारी उपाय ईमानदारी और सच्चाई से लागू किए जाएं तो आरक्षण की जरूरत जल्द ही खत्म हो जाएगी और उसके बाद ही इसके भविष्य पर चर्चा होनी चाहिए।
आरक्षण के मुद्दे के राजनीतिकरण की भी आलोचना की
मोहन भागवत ने इस मुद्दे के राजनीतिकरण की भी आलोचना की और कहा कि इससे सामाजिक सद्भाव बढ़ने के बजाय समाज में बंटवारा हुआ है। उन्होंने कहा, ‘असल में, इसे सामाजिक एकता के उपाय के तौर पर शुरू किया गया था। यह उपाय अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जो लोग इसे इस्तेमाल कर रहे हैं, वे जान बूझकर इसे गलत तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। जब तक इसे ठीक नहीं किया जाता, मुझे नहीं लगता कि कुछ भी बदलेगा।
बीते कुछ हफ्तों में कई राज्यों से आरक्षण-विरोधी प्रदर्शनों की खबरें आई हैं
गौरतलब है कि हाल के हफ्तों में राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश से आरक्षण-विरोधी प्रदर्शनों की खबरें आई हैं। कई समूह जाति-आधारित आरक्षण और यूजीसी के इक्विटी नियमों (जिन पर फिलहाल रोक लगी हुई है) की समीक्षा या उन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ (RHA) ऑनलाइन समर्थन जुटा रहा है। वहीं, नीट की तैयारी कर रहे हर्ष दुबे इस अभियान के प्रमुख चेहरों में से एक बनकर उभरे हैं। एक टीवी डिबेट के दौरान जाति-आधारित आरक्षण के खिलाफ उनकी टिप्पणी वायरल हो गई थी। वे दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने की अनुमति का इंतज़ार कर रहे हैं।
जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ चल रहा आंदोलन
जाति-आधारित आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ चल रहा आंदोलन अब सड़कों पर भी आ गया है। श्री राजपूत करणी सेना ने यूजीसी के नियमों को वापस लेने की मांग को लेकर जयपुर तक 24 दिनों की पदयात्रा की। पुलिस के साथ संगठन के करीब 2,000 सदस्यों की झड़प के बाद, उन्होंने स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा का समर्थन न करने का संकल्प लिया।
नागपुर, लखनऊ और विशाखापत्तनम में भी इसी तरह के विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरक्षण में सुधार की मांग की, जैसे कि आय-आधारित मानदंड, समय-समय पर समीक्षा और उप-वर्गीकरण। इन घटनाओं ने भारत की सबसे संवेदनशील राजनीतिक बहसों में से एक को फिर से हवा दे दी है जबकि राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अब भी बहुत सावधानी से कदम उठा रहे हैं।
‘यदि Gen Z विरोध कर रहा है तो वह देश-विरोधी नहीं’
सीजेपी के आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में RSS प्रमुख ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि जो युवा अपने से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठा रहे हैं, उन्हें देश-विरोधी नहीं कहा जाना चाहिए। उन्होंने जो देकर कहा कि उनकी चिंताओं को सुना जाना चाहिए और बातचीत व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिए उनका समाधान किया जाना चाहिए।
जब शिकायतों का समाधान नहीं होता तो विरोध एक जायज तरीका
लोकतांत्रिक समाज में बहस के महत्व पर जोर देते हुए, भागवत ने कहा कि जब शिकायतों का समाधान नहीं होता है तो विरोध आम सहमति बनाने का एक जायज तरीका है। उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र में, विरोध भी आम सहमति बनाने का एक तरीका है। बातचीत पहला कदम है, लेकिन यदि आवाज नहीं सुनी जाती तो लोगों को आंदोलन करने का अधिकार है। हालांकि, आंदोलन का मकसद सिस्टम को सुधारना होना चाहिए न कि बंटवारा पैदा करना।’
युवाओं की बदलती सोच
भागवत ने युवा पीढ़ियों की बदलती सोच पर भी प्रकाश डाला और कहा कि ‘जेन जेड’ (Gen Z) और ‘जेन अल्फा’ (Gen Alpha) के लोग अथॉरिटी पर सवाल उठाने और तार्किक स्पष्टीकरण की मांग करने के प्रति ज्यादा झुकाव रखते हैं। पिछली पीढ़ियों से तुलना करते हुए, 75 वर्षीय नेता ने कहा कि आज के युवा बिना सवाल किए बात मानने के बजाय तर्कपूर्ण जवाब चाहते हैं।
विरोध से निबटने का सबसे अच्छा तरीका रचनात्मक बातचीत
उन्होंने आधुनिक लोकतांत्रिक बातचीत की तुलना भारतीय परंपरा ‘शास्त्रार्थ’ से की, जो बहस और विचारों के आदान-प्रदान की एक प्रक्रिया है और जिसका मकसद अलग-अलग नजरियों से सच का पता लगाना है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नीति-निर्माताओं और संस्थानों को यह समझना चाहिए कि विरोध अक्सर दुश्मनी के कारण नहीं बल्कि अनसुलझी चिंताओं की वजह से होता है और उनसे निबटने का सबसे अच्छा तरीका रचनात्मक बातचीत है।
