अंतरराष्ट्रीय गिद्ध दिवस : प्रकृति के मौन प्रहरी के संरक्षण की बढ़ती चुनौती

प्रकृति में हर जीव की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है। कोई पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायक है, कोई परागण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है तो कोई खाद्य-श्रृंखला का संतुलन बनाए रखता है। गिद्ध भी इसी प्राकृतिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। देखने में भले ही वे आकर्षक न लगें, लेकिन पर्यावरण को स्वच्छ रखने में उनका योगदान किसी प्राकृतिक सफाईकर्मी से कम नहीं है। वे मृत पशुओं के शवों को तेजी से खाकर उन्हें प्रकृति के चक्र में लौटाने का काम करते हैं। इसी वजह से उन्हें अक्सर ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है।

सितम्बर के पहले शनिवार को मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय गिद्ध दिवस

हर वर्ष सितम्बर के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिवस 5 सितम्बर को मनाया गया। इसका उद्देश्य गिद्धों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ यह समझाना भी है कि इनका संरक्षण पर्यावरण, जैव-विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए क्यों आवश्यक है।

भारत में गिद्धों की कहानी विशेष रूप से चिंताजनक रही है। कभी देश के गांवों और शहरों के आसपास मृत पशुओं के शवों पर गिद्धों के झुंड आम दिखाई देते थे। लेकिन 1990 के दशक में इनकी संख्या में अचानक भारी गिरावट शुरू हुई। इसका प्रमुख कारण पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफेनाक बनी। इस दवा के अवशेष वाले पशुओं के शव खाने से बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत हुई। आज भारत में गिद्ध संरक्षण के लिए संरक्षण-प्रजनन केंद्र, गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र, सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं का इस्तेमाल, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जैसे प्रयास किए जा रहे हैं। फिर भी चुनौती बनी हुई है। गिद्धों की आबादी में स्थायी सुधार के लिए संरक्षण को केवल प्रजनन केंद्रों तक सीमित न रखकर उनके प्राकृतिक आवास, सुरक्षित भोजन और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा पर भी समान ध्यान देना होगा।

सिर्फ शव खाने वाले पक्षी नहीं, ‘प्रकृति के सफाईकर्मी’ भी कहे जाते हैं गिद्ध

गिद्धों के बारे में आम धारणा यह है कि वे केवल मृत जानवरों को खाते हैं। लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी पर्यावरणीय उपयोगिता है। किसी पशु की मृत्यु के बाद उसका शव यदि लंबे समय तक खुले में पड़ा रहे तो वह सड़ने लगता है और कई प्रकार के रोगाणुओं तथा संक्रमणों के लिए अनुकूल वातावरण बन सकता है। गिद्ध ऐसे शवों को बहुत तेजी से साफ कर देते हैं। इससे जैविक अपशिष्ट का प्राकृतिक निस्तारण होता है और पोषक तत्व फिर से पारिस्थितिकी तंत्र में लौटते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो गिद्ध प्रकृति की ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जो बिना किसी मशीन, बिजली या मानवीय हस्तक्षेप के मृत जीवों का निस्तारण करती है। यही कारण है कि किसी क्षेत्र में गिद्धों की मौजूदगी उस क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मानी जाती है। यदि किसी इलाके से गिद्ध अचानक गायब होने लगें तो यह केवल एक पक्षी की संख्या कम होने की घटना नहीं, बल्कि पूरे पर्यावरण में हो रहे बदलाव का संकेत हो सकता है।

गिद्धों का संरक्षण मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा है

गिद्ध संरक्षण को केवल वन्यजीवों की चिंता मानना सही नहीं होगा। इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से भी है। मृत पशुओं के शव लंबे समय तक खुले में पड़े रहने से रोग फैलाने वाले जीवाणुओं और अन्य रोगजनकों के पनपने की संभावना बढ़ सकती है। गिद्ध इन शवों को तेजी से खाकर इस प्राकृतिक जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। इसलिए गिद्धों की भूमिका जंगल तक सीमित नहीं है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पशुधन जीवन और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, वहां गिद्धों का महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि प्राकृतिक सफाई व्यवस्था कमजोर होती है तो मृत पशुओं के निस्तारण का बोझ मनुष्यों पर बढ़ता है। इस दृष्टि से गिद्ध संरक्षण को जैव-विविधता, पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों से जुड़ा विषय माना जाना चाहिए।

भारत में 1990 के दशक में हुई गिद्ध संकट की शुरुआत

भारत में गिद्धों की आबादी में बड़ी गिरावट 1990 के दशक में सामने आई। खासकर सफेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों की संख्या तेजी से घटने लगी। बाद में वैज्ञानिकों ने इस संकट के प्रमुख कारणों की पहचान की और पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा को इसके सबसे बड़े कारणों में पाया।

डाइक्लोफेनाक दवा गिद्धों की मौत का अहम कारण

डाइक्लोफेनाक पशुओं में दर्द और सूजन कम करने के लिए इस्तेमाल की जाती थी। समस्या तब पैदा होती थी, जब इस दवा से उपचारित पशु की मृत्यु हो जाती और उसका शव गिद्ध खाते। शव में मौजूद दवा के अवशेष गिद्धों के लिए घातक साबित होते थे। इससे उनकी किडनी काम करना बंद कर देती थी और वे मर जाते थे।

हरियाणा के पिंजौर स्थित संरक्षण केंद्र के शोध ने भी डाइक्लोफेनाक और गिद्धों की मौत के बीच मजबूत संबंध को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने बाद में पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाए। वर्ष 2006 में पशु चिकित्सा उपयोग के लिए डाइक्लोफेनाक को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई और बाद में इस पर प्रभावी नियामकीय काररवाई हुई। लेकिन केवल एक दवा पर रोक लगा देना समस्या का पूरा समाधान नहीं है। अन्य जहरीली दवाओं, विषाक्त पदार्थों, भोजन की कमी, बिजली की लाइनों, आवास के नुकसान और मानव गतिविधियों से जुड़े जोखिमों पर भी लगातार निगरानी जरूरी है।

गिद्धों की प्रमुख प्रजातियां

भारत जैव-विविधता की दृष्टि से गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण देश है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों में कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें सफेद पीठ वाला गिद्ध, लंबी चोंच वाला गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, मिस्री गिद्ध, हिमालयी ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, सिनेरियस गिद्ध और दाढ़ी वाला गिद्ध प्रमुख हैं। इनमें कुछ प्रजातियां गंभीर संकट की स्थिति में हैं। विशेष रूप से सफेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। पिंजौर का संरक्षण प्रजनन केंद्र इन्हीं प्रजातियों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

गिद्धों के सामने आज भी कई चुनौतियां

डाइक्लोफेनाक संकट सामने आने और उसके खिलाफ कदम उठाए जाने के बाद भी गिद्धों के लिए खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। उनके सामने कई नई और पुरानी चुनौतियां मौजूद हैं। सबसे पहली चुनौती है सुरक्षित भोजन की उपलब्धता। यदि पशुओं के शवों में जहरीली दवाओं के अवशेष मौजूद हैं तो गिद्धों के लिए वह भोजन खतरा बन सकता है। दूसरी बड़ी चुनौती है आवास का नुकसान। तेजी से बढ़ते शहर, सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र और बदलती भूमि उपयोग व्यवस्था गिद्धों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रही हैं।

तीसरा खतरा बिजली की हाई-वोल्टेज लाइनें हैं। उड़ते समय पक्षियों के बिजली की तारों से टकराने या करंट की चपेट में आने का खतरा रहता है। इसके अलावा जहरीले पदार्थ, कीटनाशक, मानव-वन्यजीव संघर्ष, भोजन की कमी और जलवायु परिवर्तन भी उनके लिए चिंता का विषय हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों के उपयुक्त आवास में बदलाव हो सकता है। इसलिए केवल दवाओं को सुरक्षित बनाना पर्याप्त नहीं होगा; आवास संरक्षण को भी समान महत्व देना होगा।

‘गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र’ क्यों जरूरी हैं?

गिद्धों को बचाने की दिशा में Vulture Safe Zone यानी गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र की अवधारणा बेहद महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ ऐसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र से है जहां गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन, सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाएं और उपयुक्त आवास सुनिश्चित किया जाए। ऐसे क्षेत्रों में पशु चिकित्सकों को गिद्ध-सुरक्षित दवाओं के बारे में जानकारी दी जाती है। पशुपालकों को जागरूक किया जाता है कि वे प्रतिबंधित या गिद्धों के लिए खतरनाक दवाओं का इस्तेमाल न करें। मृत पशुओं के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था की जाती है और गिद्धों की गतिविधियों पर वैज्ञानिक निगरानी रखी जाती है।

पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों के विस्तार और तकनीकी क्षमता मजबूत करने पर दिया जोर

हाल ही में पंचकूला में आयोजित अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 के राष्ट्रीय कार्यक्रम में भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों के विस्तार और तकनीकी क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया। कार्यक्रम की थीम थी ‘संकट से सुधार की ओर भारत के गिद्धों का संरक्षण’। यह थीम अपने आप में भारत के गिद्ध संरक्षण की यात्रा को समझने का अवसर देती है। एक समय जब गिद्धों की संख्या में अभूतपूर्व गिरावट ने चिंता पैदा कर दी थी, अब प्रयास यह है कि वैज्ञानिक संरक्षण और सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण के माध्यम से उनकी आबादी को फिर से मजबूत किया जाए।

पिंजौर का जटायु संरक्षण केंद्र बना उम्मीद की किरण

हरियाणा के पंचकूला जिले में स्थित जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र, पिंजौर भारत में गिद्ध संरक्षण के प्रमुख केंद्रों में शामिल है। यह हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की संयुक्त पहल है। केंद्र का उद्देश्य विशेष रूप से सफेद पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों को विलुप्ति के खतरे से बचाना है। इस केंद्र की स्थापना वर्ष 2001 में गिद्धों की संख्या में तेजी से हो रही गिरावट के अध्ययन और संरक्षण के उद्देश्य से हुई थी। बाद में इसे संरक्षण प्रजनन केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहां वैज्ञानिक तरीके से गिद्धों का प्रजनन कराया जाता है और उपयुक्त परिस्थितियों में तैयार पक्षियों को जंगल में पुनः छोड़ने की दिशा में काम किया जाता है।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गिद्ध तेजी से प्रजनन करने वाले पक्षी नहीं हैं। उनकी आबादी को प्राकृतिक रूप से बढ़ने में काफी समय लग सकता है। ऐसे में संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच बनते हैं। हालांकि विशेषज्ञों के लिए लक्ष्य केवल बंद वातावरण में गिद्धों की संख्या बढ़ाना नहीं है। अंतिम उद्देश्य यह है कि स्वस्थ गिद्धों की आबादी प्राकृतिक आवास में वापस स्थापित हो और वे स्वतंत्र रूप से अपना जीवन चक्र पूरा कर सकें।

संरक्षण प्रजनन के साथ प्राकृतिक आवास भी जरूरी

गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बात यह समझना जरूरी है कि केवल प्रजनन केंद्रों में पक्षियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यदि उन्हें जंगल में छोड़ने के बाद सुरक्षित भोजन, उपयुक्त पेड़, पानी और सुरक्षित उड़ान क्षेत्र नहीं मिलेगा तो पुनर्वास का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए संरक्षण का अगला चरण ‘कैप्टिव ब्रीडिंग से वाइल्ड रिकवरी’ यानी संरक्षण केंद्रों से प्राकृतिक आवास में सफल वापसी होना चाहिए। इसके लिए बड़े क्षेत्र में निगरानी, सुरक्षित भोजन और स्थानीय समुदाय का सहयोग आवश्यक है। भारत में गिद्ध संरक्षण की मौजूदा दिशा भी धीरे-धीरे इसी ओर बढ़ रही है। राष्ट्रीय कार्यशाला में ‘सुरक्षित लैंडस्केप’, संरक्षण प्रजनन और समुदाय की भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

जटायु : भारतीय संस्कृति और संरक्षण का सेतु

भारत में गिद्ध केवल पर्यावरणीय दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि उनका सांस्कृतिक संदर्भ भी बेहद गहरा है। रामायण में जटायु का प्रसंग गिद्ध को साहस, त्याग और कर्तव्य के प्रतीक के रूप में स्थापित करता है। जटायु ने माता सीता की रक्षा के लिए रावण का सामना किया था। इस प्रसंग ने भारतीय जनमानस में गिद्ध के प्रति एक अलग दृष्टि पैदा की। इसलिए आधुनिक संरक्षण कार्यक्रम में ‘जटायु’ नाम का इस्तेमाल केवल नाम भर नहीं है। यह भारतीय संस्कृति और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सुंदर संबंध भी बनाता है। आज जरूरत है कि जटायु की कथा को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक प्रसंग के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसके माध्यम से नई पीढ़ी को यह बताया जाए कि हमारे आसपास मौजूद प्रत्येक जीव प्रकृति की बड़ी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

समाज की भागीदारी के बिना संरक्षण अधूरा

गिद्ध संरक्षण की सफलता केवल सरकार, वैज्ञानिकों और वन विभाग पर निर्भर नहीं हो सकती। इसमें स्थानीय समुदायों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। पशुपालकों को यह जानकारी होनी चाहिए कि कौन-सी दवाएं गिद्धों के लिए सुरक्षित हैं और कौन-सी खतरनाक। पशु चिकित्सकों को गिद्ध-सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल के प्रति सजग रहना होगा। मृत पशुओं के सुरक्षित निस्तारण के लिए स्थानीय स्तर पर उचित व्यवस्था होनी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में गिद्धों को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि किसी जीव का सुंदर या आकर्षक दिखना ही उसकी उपयोगिता का पैमाना नहीं है। गिद्ध भले ही हमें सामान्य पक्षियों की तरह आकर्षक न लगें, लेकिन प्रकृति के लिए उनका महत्व असाधारण है।

विज्ञान और तकनीक से मजबूत होगी संरक्षण की मुहिम

आज गिद्ध संरक्षण में आधुनिक तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पक्षियों की पहचान, उनकी आवाजाही, भोजन के स्रोत और प्राकृतिक आवास की निगरानी के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। GPS आधारित निगरानी से यह पता लगाया जा सकता है कि गिद्ध कितनी दूरी तक जाते हैं, किन क्षेत्रों में भोजन करते हैं और किन स्थानों पर उन्हें खतरा हो सकता है। इससे संरक्षण योजनाओं को केवल अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आंकड़ों के आधार पर तैयार किया जा सकता है। इसी तरह नियमित गणना और आबादी की निगरानी से यह समझना संभव होता है कि संरक्षण कार्यक्रमों का वास्तविक असर कितना हुआ है। भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रिमोट सेंसिंग और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकें भी गिद्ध संरक्षण को और अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत

गिद्ध किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। कई प्रजातियां लंबी दूरी तय करती हैं और अलग-अलग देशों के पारिस्थितिक तंत्र से जुड़ी होती हैं। इसलिए उनका संरक्षण भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग करता है। दक्षिण एशिया में भारत, नेपाल, पाकिस्तान और अन्य देशों के बीच वैज्ञानिक जानकारी, संरक्षण तकनीक और सुरक्षित पशु चिकित्सा व्यवस्था को लेकर सहयोग महत्वपूर्ण है। इसी तरह अफ्रीका और यूरोप में गिद्धों के सामने मौजूद चुनौतियों से भी सीख ली जा सकती है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस इसी वैश्विक सोच को मजबूत करता है। यह दिवस दुनिया को याद दिलाता है कि किसी एक प्रजाति का संकट अंततः पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।

आगे की राह : गिद्ध संरक्षण को जनआंदोलन बनाना होगा

गिद्धों को बचाने के लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं है। यह समाज की साझा जिम्मेदारी है। इसके लिए कुछ कदम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। पशु चिकित्सा में गिद्ध-सुरक्षित दवाओं का इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए। प्रतिबंधित और खतरनाक दवाओं की बिक्री एवं उपयोग पर प्रभावी निगरानी हो। अधिक से अधिक गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र विकसित किए जाएं। मृत पशुओं के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था मजबूत की जाए। बिजली की लाइनों और अन्य मानव निर्मित ढांचों से पक्षियों के टकराव के जोखिम को कम किया जाए। संरक्षण प्रजनन केंद्रों को वैज्ञानिक संसाधनों से मजबूत किया जाए। जंगल में छोड़े गए गिद्धों की नियमित निगरानी की जाए। स्थानीय समुदायों और पशुपालकों को संरक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा जाए। गिद्धों की आबादी और आवास पर लगातार वैज्ञानिक अध्ययन किए जाएं। स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से जागरूकता बढ़ाई जाए।

गिद्ध बचेंगे, तभी प्रकृति का संतुलन बचेगा

अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस केवल एक विशेष पक्षी के बारे में चर्चा करने का अवसर नहीं है। यह हमें प्रकृति के उस अदृश्य तंत्र को समझने का मौका देता है, जो हमारे जीवन को सुरक्षित और संतुलित बनाए रखता है। गिद्ध मृत पशुओं के शवों को हटाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं, पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में योगदान देते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र की स्वाभाविक सफाई व्यवस्था को बनाए रखते हैं।

भारत ने गिद्ध संकट से बहुत कुछ सीखा है। डाइक्लोफेनाक से पैदा हुआ संकट यह बताता है कि मानव स्वास्थ्य या पशु चिकित्सा से जुड़ा कोई निर्णय प्रकृति के दूसरे जीवों को भी प्रभावित कर सकता है। इसी तरह संरक्षण प्रजनन केंद्रों की सफलता यह दिखाती है कि वैज्ञानिक प्रयास, सरकारी नीति और सामाजिक भागीदारी मिलकर संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने की दिशा में रास्ता बना सकते हैं।

फिलहाल मंजिल अभी दूर है। गिद्धों की वास्तविक वापसी तभी मानी जाएगी, जब वे सुरक्षित प्राकृतिक आवासों में पर्याप्त संख्या में दिखाई देने लगें और उनकी आबादी अपने दम पर बढ़ने लगे। इसलिए अब संरक्षण का लक्ष्य केवल ‘गिद्धों को बचाना’ नहीं, बल्कि ऐसा पर्यावरण तैयार करना होना चाहिए जिसमें गिद्धों को बचाने के लिए अलग से संघर्ष ही न करना पड़े। प्रकृति का संतुलन किसी एक जीव से नहीं बनता, बल्कि असंख्य जीवों के आपसी संबंधों से बनता है।

गिद्ध उस श्रृंखला की ऐसी कड़ी हैं, जिसकी अहमियत अक्सर तब समझ में आती है जब वह कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय गिद्ध दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है, जिस पक्षी को हम अक्सर उपेक्षा की नजर से देखते हैं, वही प्रकृति की स्वच्छता और संतुलन का एक महत्वपूर्ण प्रहरी है। उसे बचाना वास्तव में अपने पर्यावरण और अपने भविष्य को बचाना है।

भारत में 2026 के अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस का ‘संकट से सुधार की ओर भारत के गिद्धों का संरक्षण’ संदेश इसी दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प है। पंचकूला में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्रों, वैज्ञानिक क्षमता, संरक्षण प्रजनन और समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया गया यह संकेत है कि अब गिद्ध संरक्षण को केवल संकट प्रबंधन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पारिस्थितिक पुनर्बहाली के रूप में देखने की जरूरत है। अंततः गिद्धों की उड़ान केवल एक पक्षी की उड़ान नहीं है; यह स्वस्थ पर्यावरण, संतुलित पारिस्थितिकी और प्रकृति के साथ मनुष्य के बेहतर संबंध की उड़ान है।

लेखक : बिश्वनाथ झा (प्रसार भारती में वरिष्ठ पत्रकार)

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular