न्यूयॉर्क, 30 अगस्त। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित सार्वभौमिक एकता समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि प्रकृति और दुनिया को बचाए रखना इंसानों की जिम्मेदारी है। उन्होंने ऐसे विकास मॉडल की जरूरत बताई, जिसमें तरक्की के साथ पर्यावरण का संरक्षण भी सुनिश्चित हो।
मोहन भागवत ने कहा कि आज विकास और पर्यावरण संरक्षण को अक्सर एक-दूसरे के विपरीत माना जाता है। एक तरफ विकास को पर्यावरण के नुकसान से जोड़कर देखा जाता है तो दूसरी ओर पर्यावरण की रक्षा का मतलब विकास को रोकना समझ लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। उन्होंने कहा कि इस दिशा में रास्ता दिखाने की जरूरत है और भारत की प्राचीन सभ्यतागत सोच इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भागवत के मुताबिक, भारतीय परंपरा में त्याग और संयम के जरिए प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख दी गई है। उन्होंने कहा कि मानव जीवन में अधिकारों के साथ जिम्मेदारी का भाव भी उतना ही जरूरी है।
‘हम प्रकृति से जुड़े हैं’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि इंसान जो भी काम करे, उसे यह विचार करना चाहिए कि उसका असर केवल उसके अपने जीवन पर नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा है। भागवत ने कहा कि इंसानों को अपनी बुद्धि और समझ का इस्तेमाल प्राकृतिक दुनिया पर नियंत्रण स्थापित करने या उसे खत्म करने के लिए नहीं करना चाहिए। इसके बजाय बेहतर समझ और विवेक के साथ उन्हें जीवन के दूसरे रूपों की रक्षा की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सोचने-समझने और सही-गलत में अंतर करने की विशेष क्षमता मिली है। यही क्षमता उसे दुनिया के प्रति जिम्मेदार भी बनाती है।
‘प्रगति की कीमत पर्यावरण को नहीं चुकानी चाहिए’
खाद्य श्रृंखला में इंसानों के बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि मानव सभ्यता की प्रगति के साथ पर्यावरण को भारी नुकसान भी उठाना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि हजारों वर्षों में इंसान खाद्य श्रृंखला के निचले स्तर से शीर्ष तक पहुंच गया और इस दौरान बड़ी संख्या में पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हुईं।
उन्होंने कहा कि जानवर खतरा महसूस होने पर भाग सकते थे, इसलिए उनमें से कई बच गए, लेकिन पौधों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं था। भागवत ने कहा कि प्रकृति के साथ इंसानों का ऐसा व्यवहार उनके जीवन जीने का सही तरीका नहीं हो सकता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि इंसानों के पास सबसे अधिक समझ और विवेक होने का अर्थ यह नहीं है कि वे पूरी सृष्टि के मालिक बन गए हैं। इसके बजाय यह उन्हें प्रकृति और अन्य जीवों के अस्तित्व की रक्षा करने की जिम्मेदारी देता है।
‘दूसरों को सिर्फ जीने न दें, जीने में मदद करें’
मोहन भागवत ने कहा कि इंसान प्रकृति की सीमाओं से आगे निकलकर बेहतर जीवन जीने में सक्षम हुआ है, इसलिए अब उसकी जिम्मेदारी है कि वह बाकी जीवन और प्रकृति के अस्तित्व को भी सुरक्षित रखे।
उन्होंने लोगों से अपील की कि वे केवल दूसरों को जीने देने की सोच तक सीमित न रहें, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें दूसरे भी आगे बढ़ सकें। उन्होंने कहा कि समाज में एक-दूसरे की मदद और सहयोग की भावना विकसित करनी होगी।
भागवत ने कहा कि व्यक्ति को अपने जीवन और कार्यों के जरिए दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। उनका संदेश था कि इंसान खुद भी खुशहाल जीवन जिए और दूसरों को भी बेहतर जीवन जीने में सहयोग करे।
‘बदलाव की शुरुआत रोजमर्रा की जिंदगी से हो’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि बड़े बदलाव के लिए हमेशा किसी व्यापक अभियान या नई व्यवस्था का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। रोजमर्रा के व्यवहार और जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलावों के जरिए भी परिवर्तन की शुरुआत की जा सकती है।
उन्होंने इस दौरान आरएसएस के ‘पंच परिवर्तन’ कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। भागवत ने कहा कि इसके सिद्धांतों को पहले व्यक्ति को अपने जीवन में अपनाना होगा और उसके बाद इन्हें समाज तक पहुंचाना होगा। उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों का उद्देश्य मानवता, पर्यावरण और पूरी सृष्टि के अस्तित्व को सुरक्षित रखना है। उनके मुताबिक, यही आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत और लक्ष्य है।


