UPI भुगतान पर विवाद को लेकर सरकार का स्पष्टीकरण- ‘फैसला वापस लेने का सवाल ही नहीं…’

नई दिल्ली, 16 सितम्बर। केंद्र सरकार ने 2,000 रुपये से ज्यादा के UPI भुगतान पर शुल्क लगाने के फैसले से उपजे विवाद के बाद स्प्ष्ट किया कि जो फैसला लिया जा चुका है, उसे वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता।

उल्लेखनीय है कि मंगलवार को केंद्र सरकार की तरफ से UPI को लेकर नया फ्रेमवर्क बनाया गया, जिसे 15 अक्टूबर से लागू किया जाना है। सरकार के इस कदम के बाद से विपक्ष फैसले को वापस लेने का दबाव बना रहा है। इसी को लेकर बुधवार को सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जवाब दिया।

नए फ्रेमवर्क में क्या है?

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन आफ इंडिया (NPCI) ने मंगलवार को एक नया फ्रेमवर्क पेश किया। इसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूनीफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेनदेन पर 40 बेसिस प्वॉइंट (bps) यानी 0.4 प्रतिशत का शुल्क या मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगेगा।

UPI MDR Fees : 2000 रुपये से ऊपर के भुगतान पर 0.40% MDR लगेगा, हर ट्रांजैक्शन पर 300 रुपये की अधिकतम सीमा तय

नए नियम के अनुसार 100 रुपये के यूपीआई भुगतान पर चार पैसे का शुल्क आएगा। हालांकि 2000 रुपये तक का भुगतान पर एमडीआर नहीं लगेगा। यह नियम 75,000 रुपये से ऊपर के हर भुगतान पर लागू होगा और हर ट्रांजैक्शन पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। यानी कि 75,000 रुपये से अधिक के हर ट्रांजैक्शन पर 300 रुपये का MDR फिक्स रहेगा।

छोटे दुकानदारों पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यूपीआई से महीने में एक लाख रुपये तक भुगतान लेने वाले छोटे दुकानदारों पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा। रेलवे, बीमा, संचार और ईंधन जैसी चुनिंदा सेवाओं के लिए 2,000 रुपये से ऊपर के भुगतान पर सिर्फ पांच रुपये का फ्लैट शुल्क लगेगा। नया ढांचा 15 अक्टूबर, 2026 से लागू होगा। उल्लेखनीय है कि व्यक्ति से व्यापारी को कुल लेनदेन में 2000 से कम के भुगतान की हिस्सेदारी करीब 95 प्रतिशत है।

क्या होता है एमडीआर?

एमडीआर एक छोटा सा शुल्क है, जो दुकानदार बैंकों और पेमेंट कम्पनियों को तब देते हैं, जब कोई ग्राहक डिजिटल पेमेंट करता है। ग्राहक डिजिटल पेमेंट सिस्टम के जरिए दुकानदार को पेमेंट करता है और दुकानदार पेमेंट प्रोवाइडर को एक छोटी प्रोसेसिंग फीस देता है। उदाहरण के लिए 2000 रुपये के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर आठ रुपये होता है। इसका भुगतान दुकानदार बैंक या पेमेंट प्रोवाइडर को करेगा, लेकिन ग्राहक यूपीआई का इस्तेमाल मुफ्त में करते रहेंगे।

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