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बांग्लादेश चुनाव : बीएनपी को 209 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत

Revoi Editor
Last updated: February 13, 2026 7:34 pm
Revoi Editor
Published: February 13, 2026
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ढाका, 13 फरवरी। बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव में तारिक रहमान की अगुआई वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने सबसे ज्यादा 209 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। 299 सीटों पर चुनाव हुआ था जबकि एक सीट पर उम्मीदवार की मौत होने पर वोटिंग नहीं हो सकी। बीएनपी गठबंधन को कुल 212 सीटें मिली हैं। बीएनपी के सहयोगी दलों गणोसम्हति आंदोलन, बांग्लादेश जातीय पार्टी और गोनो ओधिकार परिषद ने एक-एक सीट जीती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय तक सत्ता में रही आवामी लीग चुनाव लड़ ही नहीं सकी। BNP के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के दावेदार तारिक रहमान इस चुनाव में दो सीटों से मैदान में थे और उन्होंने दोनों सीटों ढाका-17 और बोगरा-6 से जीत दर्ज कर ली। 17 वर्ष बाद बांग्लादेश लौटे तारिक रहमान की प्रधानमंत्री के रूप मैं तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।

जमात गठबंधन को मिलीं 77 सीटें

इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसने 68 सीटें जीतकर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। वहीं जमात गठबंधन ने कुल 77 सीटें जीती हैं। इसमें कमल के सिंबल वाली नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) को 6 सीटों पर जीत मिली जबकि बांग्लादेश खिलाफत मजलिस को दो और खिलाफत मजलिस को एक सीट मिली। इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश को सिर्फ एक सीट मिली जबकि सात सीटों पर इंडिपेंडेंट कैंडिडेट जीते। चुनाव आयोग ने जमात-ए-इस्लामी कैंडिडेट नूरुज्जमां बडोल की मौत के बाद शेरपुर-3 (श्रीबोर्डी-झेनाइगाटी) सीट पर चुनाव टाल दिए।

चुनाव परिणामों में कई ऐसे दल भी रहे जिनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन वे पूरी तरह नाकाम रहे। इनमें जातीय समाजवादी दल (JASAD), लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, वर्कर्स पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी समेत दर्जनों दल शामिल हैं, जिन्हें एक भी सीट नहीं मिल सकी। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि इस बार कई दलों का सूपड़ा साफ हो गया।

12 करोड़ से अधिक लोगों ने किया मतदान

इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की भागीदारी रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक BNP की छह महिला उम्मीदवार जीत हासिल करने में सफल रहीं। हालांकि इस बार का चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक रहा कि कई दशकों बाद बांग्लादेश की राजनीति में शीर्ष स्तर पर कोई महिला नेता चुनावी मैदान में नहीं थी। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी चुनाव से बाहर रही जबकि उनकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का पिछले वर्ष निधन हो गया था।

चुनाव आयोग के अनुसार देशभर में लगभग 59.44 प्रतिशत मतदान हुआ। करीब 12.7 करोड़ मतदाताओं में से बड़ी संख्या में पहली बार वोट देने वाले मतदाता शामिल थे। सुरक्षा के लिहाज से करीब दस लाख सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई थी, जो देश के चुनावी इतिहास में सबसे बड़ा सुरक्षा इंतजाम माना जा रहा है।

18 महीने बाद बांग्लादेश में हुए चुनाव

उल्लेखनीय है कि पिछले 18 महीने बांग्लादेश के लिए आसान नहीं रहे हैं। इन 18 महीनों में बांग्लादेश हिंसा, आगजनी, लूटपाट और अव्यवस्था का शिकार होता रहा। अगस्त 2024 में छात्रों की अगुआई में हुई क्रांति ने शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका। सरकार का पतन होते ही हसीना ने भाग कर भारत में शरण ली। इस दौरान बांग्लादेश में हिंसा में 1,400 से ज्यादा मौतें हुईं। वहीं बांग्लादेश में नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी। तब बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियों ने इसे ‘दूसरी आजादी’ करार दिया था।

12 फरवरी को हुए चुनाव में हर वोटर ने दो वोट डाले थे। ऐसा पहली बार हुआ था। एक वोट नई सरकार चुनने के लिए डाला गया जबकि दूसरा ‘जुलाई चार्टर’ यानी जनमत संग्रह के लिए था। इसका मकसद लोगों की संविधान में बदलाव को लेकर राय लेना था। जनमत संग्रह के नतीजों के मुताबिक लोगों ने भारी मतों से ‘यस वोट’ को चुना है। इसका मतलब यह है कि बांग्लादेश की जनता संविधान में संशोध

न चाहती है।

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