वॉशिंगटन/नई दिल्ली, 10 जुलाई। प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर उठ रही चिंताओं और गलतफहमियों के बीच भारत ने स्पष्ट किया है कि इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग पर निगरानी और पारदर्शिता को मजबूत करना है, न कि कानून का पालन करने वाले नागरिक संगठनों (सिविल सोसायटी) का काम बंद करना। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रस्तावित विधेयक को लेकर विस्तृत स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि मीडिया और सिविल सोसायटी के बीच FCRA संशोधन विधेयक को लेकर कई तरह की गलतफहमियां हैं।
विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण हर देश का अधिकार
क्वात्रा ने उस दावे को खारिज किया कि भारत ऐसा नया कानून ला रहा है, जिसका उद्देश्य नागरिक संगठनों को मिलने वाली विदेशी सहायता रोकना है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना हर देश का संप्रभु अधिकार है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के आधार पर किया जाता है। उन्होंने कहा कि कई लोकतांत्रिक देशों में विदेशी फंडिंग का नियमन आधुनिक शासन व्यवस्था का सामान्य हिस्सा है।
राजदूत ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित कानून भारतीयों को विदेशी दान लेने से नहीं रोकता और न ही कानून का पालन करने वाले नागरिक संगठनों को बंद करता है। उनके अनुसार, FCRA के तहत हजारों संगठन पंजीकृत हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, शोध तथा मानवीय सहायता जैसे क्षेत्रों में विदेशी फंड प्राप्त कर रहे हैं।
1976 में आया था पहला FCRA कानून
क्वात्रा ने बताया कि भारत में पहला FCRA कानून 1976 में लागू हुआ था। इसके बाद 2010 में इसे आधुनिक स्वरूप दिया गया और 2016, 2018 तथा 2020 में इसमें बदलाव किए गए। उन्होंने कहा कि 2026 का प्रस्तावित विधेयक और उससे जुड़े नियम इसी प्रक्रिया की अगली कड़ी हैं, जिनका उद्देश्य अधिक पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और स्पष्ट नियम सुनिश्चित करना है।
2024-25 में 2.67 अरब डॉलर विदेशी योगदान
FCRA से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए क्वात्रा ने कहा कि पंजीकृत संगठनों को मिलने वाला विदेशी योगदान 2010-11 में करीब 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया। उन्होंने बताया कि भारत में 30 लाख से अधिक NGO हैं, लेकिन इनमें से केवल 14,450 संगठनों के पास FCRA पंजीकरण है। यानी अधिकांश नागरिक संगठन इस कानून के दायरे में नहीं आते।
क्वात्रा ने FCRA की मूल व्यवस्था को समझाते हुए कहा कि कानून विदेशी दान, शोध अनुदान या मानवीय सहायता लेने पर रोक नहीं लगाता। इसके तहत संगठनों को पंजीकरण कराना, निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार धन प्राप्त करना और उसके इस्तेमाल का विवरण देना होता है।
NGO की संपत्ति जब्त होने की आशंका पर भी सफाई
FCRA संशोधन को लेकर उन आशंकाओं पर भी क्वात्रा ने सफाई दी, जिनमें कहा जा रहा था कि NGO, धार्मिक संस्थाओं, पूजा स्थलों, अस्पतालों और स्कूलों की विदेशी चंदे से बनी संपत्तियां जब्त की जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द होने या संस्था द्वारा खुद पंजीकरण छोड़ने की स्थिति में विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियां और बची हुई राशि पहले से ही राज्य सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण के पास जाने की व्यवस्था 2010 से लागू है।
उनके मुताबिक, 2026 का प्रस्तावित विधेयक केवल इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक निर्धारित प्राधिकरण की व्यवस्था करता है और संगठन को दोबारा पंजीकरण बहाल कराने का रास्ता भी देता है। यदि पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संपत्तियां और बची हुई राशि संबंधित संगठन को वापस कर दी जाएंगी।
पूजा स्थलों के लिए भी विशेष प्रावधान
क्वात्रा ने बताया कि यदि किसी ऐसे संगठन का FCRA पंजीकरण रद्द होता है, जिसने किसी पूजा स्थल से जुड़ी संपत्ति बनाई है, तो उस संपत्ति को उसी धर्म के किसी अन्य FCRA-पंजीकृत संगठन को सौंपा जाएगा। इसका उद्देश्य धार्मिक गतिविधियों को बिना बाधा जारी रखना है। उन्होंने इस आरोप को भी खारिज किया कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाता है।
क्वात्रा के अनुसार, कानून धर्म, समुदाय या विचारधारा की परवाह किए बिना सभी संगठनों पर समान रूप से लागू होगा। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों से जुड़े संगठनों द्वारा संचालित कल्याणकारी कार्य, धार्मिक शिक्षा, पूजा स्थलों का रखरखाव और चैरिटी से जुड़े काम विदेशी फंडिंग हासिल करने के लिए पहले की तरह पात्र बने रहेंगे।
