इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद की शिक्षक की बर्खास्तगी, कहा- लंबी सेवा के बाद बिना आधार नौकरी से हटाना गलत
प्रयागराज, 21 अप्रैल। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में गौतम बुद्ध नगर के एक हेडमास्टर मुकेश कुमार शर्मा की सेवा समाप्ति का आदेश रद करते हुए उन्हें बड़ी राहत प्रदान की। हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लगभग तीन दशकों की बेदाग सेवा के बाद किसी शिक्षक को केवल इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि उसने एक ही सत्र में दो डिग्रियां हासिल की थीं, खासकर तब जब ऐसा करने पर कोई कानूनी रोक न हो।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह आदेश मुकेश कुमार शर्मा द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। मामले के अनुसार, याची की नियुक्ति 1997 में अप्रशिक्षित सहायक अध्यापक के रूप में हुई थी और बाद में प्रशिक्षण पूरा करने पर उन्हें नियमित वेतनमान दिया गया। वर्ष 2025 में एक शिकायत के आधार पर बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनकी सेवाएं इस आधार पर समाप्त कर दी थीं कि उन्होंने सत्र 1993-94 में इंटरमीडिएट और शारीरिक शिक्षा प्रमाणपत्र दोनों नियमित रूप से प्राप्त किए थे।
अदालत ने पाया कि इस काररवाई से पहले न तो कोई नियमित विभागीय जांच की गई और न ही याची को अपनी बात रखने का उचित अवसर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक अनुशासन एवं अपील नियमावली का खुला उल्लंघन है।
कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘कुलदीप कुमार पाठक’ केस का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई वैधानिक रोक नहीं है, तो दो परीक्षाओं में एक साथ बैठने को अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि याची के शैक्षिक प्रमाणपत्र आज भी वैध हैं और उन्हें किसी सक्षम प्राधिकारी ने रद नहीं किया है। कोर्ट ने बीएसए द्वारा जारी 11 दिसम्बर, 2025 के बर्खास्तगी आदेश को मनमाना और दोषपूर्ण करार देते हुए इसे खारिज कर दिया।
