नई दिल्ली, 29 अक्टूबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संस्कृत सुभाषितम् साझा किया। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में बताया गया है कि मनुष्य की श्रद्धा, सोच और स्वभाव उसके व्यक्तित्व को आकार देते हैं। श्लोक का संदेश है कि व्यक्ति जैसी श्रद्धा रखता है, उसका आचरण और व्यक्तित्व भी वैसा ही बनता जाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, “सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥” यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग के तीसरे श्लोक से लिया गया है। इसका भावार्थ है कि प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण और स्वभाव के अनुरूप होती है। मनुष्य की सोच, विश्वास और आचरण उसकी श्रद्धा से प्रभावित होते हैं। वह जिस प्रकार की श्रद्धा रखता है, धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व भी उसी के अनुरूप ढलता जाता है।
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ने समझाया श्रद्धा का महत्व
गीता का यह श्लोक अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के बीच हुए संवाद से जुड़ा है। अर्जुन ने पूछा था कि जो लोग शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन किए बिना अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी निष्ठा सात्त्विक, राजसिक या तामसिक में से किस प्रकार की होती है।
इसके उत्तर में श्रीकृष्ण श्रद्धा के विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या करते हैं। वह बताते हैं कि व्यक्ति के मन की प्रकृति उसकी श्रद्धा को प्रभावित करती है और यही श्रद्धा उसके जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बुधवार को प्रकृति संरक्षण का दिया था संदेश
इससे पहले बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत सुभाषितम् के माध्यम से प्रकृति की रक्षा और देखभाल का संदेश दिया था। उन्होंने लिखा था, “पालयन् प्रकृतिं राजा सुखी भवति नान्यथा। प्रकृतिश्च हिता यस्य स राजा सर्वकामधुक्॥”
इसका भावार्थ है कि जो शासक प्रकृति की रक्षा करता है और उसके कल्याण के लिए काम करता है, वह सुखी और समृद्ध रहता है। प्रकृति का संरक्षण करने वालों को भी उसके सकारात्मक परिणाम मिलते हैं। इस सुभाषितम् के जरिए प्रधानमंत्री ने प्रकृति के संरक्षण और जनकल्याण के बीच संबंध को रेखांकित किया था।


