योगिनी एकादशी 2026 : त्रिपुष्कर योग और भरणी नक्षत्र के दुर्लभ संयोग में रखें व्रत, जानें तिथि, पूजा विधि और महत्व
नई दिल्ली, 9 जुलाई। आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। यह एकादशी भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा, नियम और विधि-विधान से व्रत एवं पूजा करने पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन के अनेक कष्ट दूर होते हैं। इस वर्ष योगिनी एकादशी का महत्व और भी बढ़ गया है, क्योंकि इस अवसर पर त्रिपुष्कर योग और भरणी नक्षत्र का दुर्लभ एवं शुभ संयोग बन रहा है।
योगिनी एकादशी 2026 की तिथि
पंचांग के अनुसार योगिनी एकादशी तिथि 10 जुलाई सुबह 8:16 बजे से प्रारंभ होकर 11 जुलाई सुबह 5:00 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार गृहस्थ श्रद्धालु 10 जुलाई को व्रत रखेंगे, जबकि वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले भक्त 11 जुलाई को योगिनी एकादशी का व्रत करेंगे। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में भगवान विष्णु की पूजा के बाद विधिपूर्वक किया जाएगा।
त्रिपुष्कर योग और भरणी नक्षत्र का शुभ संयोग
इस बार योगिनी एकादशी पर त्रिपुष्कर योग और भरणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस शुभ योग में भगवान विष्णु की उपासना, मंत्र-जप, दान और व्रत करने से सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है। देशभर के विष्णु मंदिरों में विशेष श्रृंगार, पूजन, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण जैसे धार्मिक आयोजन भी होंगे।
योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक ग्रंथों में योगिनी एकादशी को पापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति को मानसिक शांति, सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही जीवन में आने वाले दुख, दरिद्रता और कलंक का भी नाश होता है।
ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
योगिनी एकादशी के दिन प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें। भगवान का शंख से अभिषेक करना शुभ माना जाता है। पूजा में तुलसी की मंजरी अर्पित करें और पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु को चावल अर्पित नहीं किए जाते और व्रतधारी भी चावल का सेवन नहीं करते।
योगिनी एकादशी की पौराणिक कथा
योगिनी एकादशी की कथा अलकापुरी के राजा कुबेर के सेवक हेममाली से जुड़ी है। कथा के अनुसार हेममाली ने अपने कर्तव्यों की उपेक्षा कर देव पूजन की सामग्री का अनुचित उपयोग किया, जिसके कारण उसे गंभीर रोग और कष्ट भोगने पड़े। बाद में देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में उसने योगिनी एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से उसे रोग से मुक्ति मिली और वह पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर सका। इसी कारण इस एकादशी को प्रायश्चित, आत्मशुद्धि और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष पर्व माना जाता है।
आस्था और आत्मसंयम का पर्व
योगिनी एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, श्रद्धा और भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन नियमपूर्वक व्रत रखकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक उन्नति के साथ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस वर्ष त्रिपुष्कर योग और भरणी नक्षत्र का शुभ संयोग इस एकादशी को और भी अधिक फलदायी बना रहा है।
