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वट सावित्री व्रत 2026 : 16 मई को रखा जाएगा अखंड सौभाग्य का महाव्रत, जानें पूजा विधि

वट सावित्री व्रत 2026 : 16 मई को रखा जाएगा अखंड सौभाग्य का महाव्रत, जानें पूजा विधि

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लखनऊ, 15 मई। हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास के दौरान आने वाला वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन बरगद के वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 16 मई को रखा जाएगा। इस बार वट सावित्री व्रत का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि इसी दिन शनिश्चरी अमावस्या और शनि जयंती का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है। धार्मिक शास्त्रों में बरगद के वृक्ष को देवताओं का निवास स्थान माना गया है। मान्यता है कि इस वृक्ष की आयु अत्यंत लंबी होती है, इसलिए विवाहित महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब सहित कई राज्यों में यह व्रत विशेष श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।

वट सावित्री व्रत का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई 2026 को प्रातः 5 बजकर 11 मिनट से होगी और इसका समापन 17 मई को देर रात 1 बजकर 30 मिनट पर होगा। ऐसे में 16 मई को ही वट सावित्री व्रत रखा जाएगा। इस दिन सुबह स्नान और पूजा के बाद वट वृक्ष की विधिपूर्वक पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है। इस वर्ष व्रत के दिन सौभाग्य योग और शोभन योग का विशेष संयोग बन रहा है। सौभाग्य योग 15 मई की दोपहर से शुरू होकर 16 मई की सुबह तक प्रभावी रहेगा, जिसके बाद शोभन योग आरंभ होगा। धार्मिक मान्यताओं में इन योगों को पूजा-पाठ और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही भरणी और कृत्तिका नक्षत्र का प्रभाव भी इस दिन को विशेष बना रहा है।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

व्रत वाले दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद घर में पवित्र जल का छिड़काव कर पूजा की तैयारी की जाती है। महिलाएं बांस की टोकरी में सात प्रकार के धान्य रखकर उसमें ब्रह्मा, सावित्री और सत्यवान की प्रतिमा स्थापित करती हैं। फिर वट वृक्ष के नीचे जाकर पूजा की जाती है।

पूजन के दौरान जल, रोली, अक्षत, कच्चा सूत, भीगे चने, फूल, धूप और दीप का उपयोग किया जाता है। वट वृक्ष को जल अर्पित करने के बाद उसके तने पर कच्चा धागा लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं 108 बार धागा लपेटकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। इसके बाद सावित्री और सत्यवान की कथा सुनी जाती है तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। पूजा के अंत में सास का आशीर्वाद लेने की परंपरा भी मानी जाती है। साथ ही दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है और जरूरतमंद लोगों को वस्त्र, फल तथा अन्य सामग्री दान की जाती है।

वट सावित्री व्रत में उपयोग होने वाली सामग्री

इस व्रत की पूजा में सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा, धूप, दीप, घी, लाल कलावा, कच्चा सूत, सुहाग सामग्री, जल से भरा कलश, बांस की टोकरी, भीगे चने, बरगद का फल और पुष्प आदि का उपयोग किया जाता है। पूजा सामग्री को श्रद्धा और विधि के अनुसार तैयार करना शुभ माना जाता है।

वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावित्री ने अपने तप, समर्पण और दृढ़ संकल्प से अपने पति सत्यवान को पुनर्जीवन दिलाया था। कहा जाता है कि सत्यवान के प्राण हरने आए यमराज को भी सावित्री की निष्ठा के आगे झुकना पड़ा। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान शिव के आशीर्वाद से महर्षि मार्कण्डेय को वट वृक्ष के पत्ते पर बाल मुकुंद के दर्शन हुए थे। तभी से वट वृक्ष की पूजा का महत्व और अधिक बढ़ गया। मान्यता है कि इस वृक्ष की पूजा करने से घर में सुख-शांति, धन और समृद्धि का वास होता है।

सावित्री और सत्यवान की अमर कथा

पौराणिक कथा के अनुसार राजर्षि अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत तेजस्वी और गुणवान थीं। उन्होंने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपना पति चुना। जब देवर्षि नारद ने बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं, तब भी सावित्री अपने निर्णय से पीछे नहीं हटीं। विवाह के बाद सावित्री अपने पति और ससुराल के साथ वन में रहने लगीं। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन वह जंगल में लकड़ी काटते समय अचेत होकर गिर पड़े। उसी समय यमराज उनके प्राण लेने पहुंचे। सावित्री भी यमराज के पीछे चल पड़ीं और अपने पति के प्राण वापस देने की प्रार्थना करने लगीं।

सावित्री की अटूट निष्ठा और त्याग से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने अपने सास-ससुर की दृष्टि, उनका खोया हुआ राज्य और अपने लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा। यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ कि बिना सत्यवान को जीवित किए यह वरदान पूर्ण नहीं हो सकता। अंततः उन्होंने सत्यवान को जीवनदान दिया और सावित्री को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। इसी कथा के कारण वट सावित्री व्रत को पति-पत्नी के अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

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