1. Home
  2. हिन्दी
  3. राष्ट्रीय
  4. सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- सत्ता मिलते ही ‘दोहरा रवैया’ दिखाते हैं राजनीतिक दल…
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- सत्ता मिलते ही ‘दोहरा रवैया’ दिखाते हैं राजनीतिक दल…

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा बयान, कहा- सत्ता मिलते ही ‘दोहरा रवैया’ दिखाते हैं राजनीतिक दल…

0
Social Share

नई दिल्ली, 8 मई। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की मांग करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद या तो इस मुद्दे पर चुप हो जाते हैं या फिर बिल्कुल उलट रुख अपना लेते हैं, जो देश के लिए “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि जो भी सत्ता में आता है, चुनाव आयोग के संबंध में ऐसा ही करता है। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

उन्होंने एक सांसद के “निर्वाचित नहीं होने वालों की तानाशाही” संबंधी बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे “निर्वाचित लोगों की तानाशाही” के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इस पर न्यायमूर्ति शर्मा ने टिप्पणी की कि यह “बहुमत की तानाशाही” है। गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा हैं और इसके लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव आयोग अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने वाली हर सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अभाव का फायदा उठाया और उसका दुरुपयोग किया।

भूषण ने कहा, “जब लोग विपक्ष में थे तब वे स्वतंत्र संस्था की मांग कर रहे थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने इसकी परवाह करना बंद कर दिया।” उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पर कार्यपालिका का वर्चस्व नहीं हो सकता, खासकर तब जब आयोग अर्ध-न्यायिक भूमिका भी निभाता है। उन्होंने दो मार्च 2023 के उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तब न्यायालय ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सलाह पर करने का निर्देश दिया था।

वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कहा कि अदालत कानून नहीं बना रही, लेकिन यह जरूर परख सकती है कि नया कानून 2023 के फैसले में निर्धारित संवैधानिक मानकों का पालन करता है या नहीं। याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा सात और आठ को चुनौती दी गयी है। इन धाराओं के तहत नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है, जबकि मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाने से नियुक्ति प्रक्रिया सरकार के पक्ष में झुक जाती है और पक्षपातपूर्ण प्रभाव की आशंका बढ़ जाती है।

Join our WhatsApp Channel

And stay informed with the latest news and updates.

Join Now
revoi whats app qr code