नई दिल्ली, 12 अगस्त। लोकसभा अध्यक्ष की ओर से जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के परिसर में कैश मिलने के आरोपों की जांच के लिए ‘जजेज़ (इंक्वायरी) एक्ट’ के तहत गठित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी है। समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा को दोषी पाया है और उनके खिलाफ काररवाई की सिफारिश की है।
जस्टिस वर्मा के खिलाफ समिति ने काररवाई की सिफारिश की
इस रिपोर्ट के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ होने वाली काररवाई को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि, अप्रैल में ही राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजने वाले जस्टिस यशवंत वर्मा पर क्या काररवाई होगी, इसे लेकर अब भी संशय बना हुआ है। फिलहाल सरकारी सूत्रों की मानें तो शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।
समिति का निष्कर्ष – जस्टिस वर्मा संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे
समिति ने रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ बिना हिसाब वाली नकदी, सबूतों से छेड़छाड़ और संतोषजनक जवाब नहीं देने के आरोप ‘साबित’ होते हैं। समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत या मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे। समिति ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित नहीं रखा गया। साथ ही कानूनी तरीके से सील करने और निरीक्षण से पहले स्टोर रूम में मौजूद सबूतों की स्थिति को बदल दिया गया।
समिति की रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की गई है
मीडिया की खबरों के अनुसार समिति की रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की गई है, जिसमें जांच के दौरान दर्ज मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं। जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी।
उल्लेखनीय है कि 14 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास के एक स्टोर रूम में आग लगी थी, जहां पर कथित तौर पर उनके घर से बड़ी मात्रा में कैश मिला था। इसके बाद 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस यशवंत वर्मा के बचाव संबंधी एक रिपोर्ट जारी की।
इस रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस द्वारा दी गई कुछ फोटो और वीडियो भी शामिल हैं, जिसमें जले हुए नोट नज़र आ रहे हैं। हालांकि, रिपोर्ट के कुछ हिस्सों को ‘रिडेक्ट’ किया गया था, यानी काले रंग से छिपाया गया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय को एक प्रारंभिक पूछताछ करने को कहा था। जस्टिस डीके उपाध्याय ने अपनी चिट्टी में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को कहा कि इस मामले में एक ‘गहरी जांच’ की जरूरत है। वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा ने दावा किया कि स्टोर रूम में उन्होंने या उनके परिवार वालों ने कभी कैश नहीं रखा और उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है.
तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की समिति बनाई। साथ ही यह फैसला लिया कि जस्टिस यशवंत वर्मा को कुछ समय तक कोई न्यायिक ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने प्रस्ताव दिया कि जस्टिस वर्मा को दिल्ली से हटाकर वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया जाए। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने फैसले पर आपत्ति जताई थी। जिस इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस वर्मा का विरोध किया, कभी वह इस एसोसिएशन का हिस्सा थे।
छह जनवरी, 1969 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे जस्टिस यशवंत वर्मा 30 वर्ष से भी ज़्यादा लंबे समय से कानूनी पेशे से जुड़े रहे हैं। करीब 200 सांसदों ने संसद के माध्यम से उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे दिया था।

