प्रयागराज, 18 जुलाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में वकालत के पेशे में कथित अपराधी तत्वों और फर्जी डिग्रीधारी अधिवक्ताओं की बढ़ती मौजूदगी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कमजोर होगा।
अधिवक्ता सिर्फ मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं बल्कि न्याय वितरण प्रणाली के अभिन्न अंग
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिवक्ता सिर्फ अपने मुवक्किल के प्रतिनिधि नहीं बल्कि न्याय वितरण प्रणाली के अभिन्न अंग होते हैं। ऐसे में उनके आचरण और पेशे की शुचिता बनाए रखना बार काउंसिल और न्यायपालिका दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने मोहम्मद कफील की याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के आपराधिक रिकॉर्ड, फर्जी डिग्रियों और बार काउंसिल की अनुशासनात्मक व्यवस्था पर व्यापक समीक्षा की। अदालत ने राज्य के डीजीपी, डीजीपी (अभियोजन), उत्तर प्रदेश बार काउंसिल तथा रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एवं चिट्स से विस्तृत रिपोर्ट तलब की।
मामले में याची ने इटावा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस अधिकारियों को तलब करने से इनकार करने वाले आदेश और पुनरीक्षण न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा गया था। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश रिपोर्टों ने प्रदेश में अधिवक्ता समुदाय से जुड़े कई गंभीर तथ्यों को उजागर किया।
4157 वकीलों पर 5056 मुकदमे
अदालत के समक्ष पेश रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में 5.14 लाख से अधिक सक्रिय अधिवक्ता पंजीकृत हैं। इनमें 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 418 अधिवक्ताओं पर तीन या उससे अधिक मुकदमे लंबित हैं जबकि कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ 40 से अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज होने के बावजूद वे लगातार वकालत कर रहे हैं। वहीं प्रमाणपत्र सत्यापन अभियान में 105 अधिवक्ताओं की कानून की डिग्रियां फर्जी पाई गईं।
प्रभावी काररवाई नहीं कर पा रही बार काउंसिल
हाई कोर्ट ने पाया कि बार काउंसिल की अनुशासनात्मक व्यवस्था अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं है। बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक काररवाई नगण्य रही। अदालत ने यह भी कहा कि बार काउंसिल के चुनावों के दौरान अनुशासनात्मक समितियों के भंग हो जाने से लंबित मामलों का निस्तारण वर्षों तक प्रभावित रहता है, जिसका लाभ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वकालत करने वाले लोग उठाते हैं।
105 वकीलों पर मुकदमा दर्ज करने का निर्देश
उच्च न्यायलय ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को निर्देश दिया कि फर्जी डिग्री वाले 105 अधिवक्ताओं के विरुद्ध धोखाधड़ी, जालसाजी और प्रतिरूपण सहित संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जाए। साथ ही जिन अधिवक्ताओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं, उनके विरुद्ध तत्काल अनुशासनात्मक काररवाई शुरू कर आवश्यकता पड़ने पर उनकी प्रैक्टिस का लाइसेंस निलंबित किया जाए। कोर्ट ने जिला न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों और बार काउंसिल के बीच नियमित सूचना आदान-प्रदान की व्यवस्था विकसित करने के भी निर्देश दिए, ताकि ऐसे मामलों पर समयबद्ध काररवाई सुनिश्चित हो सके।
वकालत में गैंगस्टर, माफिया के प्रवेश पर जताई चिंता
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय के अंत में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्य केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि विधि व्यवसाय में गहरे संस्थागत और नैतिक संकट का संकेत देते हैं। उत्तर प्रदेश में वकालत के पेशे में गैंगस्टर, माफिया, आदतन अपराधियों और फर्जी शैक्षणिक योग्यता रखने वाले व्यक्तियों की घुसपैठ न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए गंभीर खतरा है।
अदालत ने कहा कि बार काउंसिल यदि अपने वैधानिक दायित्वों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं करती है तो विधि व्यवसाय की गरिमा और न्यायपालिका में आमजन का विश्वास दोनों प्रभावित होंगे। इसलिए समय की मांग है कि पेशे की शुचिता बनाए रखने के लिए कठोर, पारदर्शी और सतत सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, ताकि न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा और जनता का भरोसा अक्षुण्ण रह सके।
फर्जी पत्रकारों की बढ़ती संख्या पर दिल्ली हाई कोर्ट जता चुका है चिंता
दिलचस्प यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट एक दिन पहले ही फर्जी पत्रकारों की बढ़ती संख्या पर यह कहते हुए गंभीर चिंता चुका है हाथ में मोबाइल व माइक लेकर कोई भी रिपोर्ट बन जा रहा है। हाई कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि ऐसी प्रवृत्ति पर रोक लगाना बहुत जरूरी है।
संतुलित और प्रभावी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने पर बल
पत्रकारिता और मीडिया की बदलती तस्वीर पर अहम टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि आज के दौर में मोबाइल फोन और माइक्रोफोन रखने वाला लगभग हर व्यक्ति खुद को रिपोर्टर बताने लगा है। कोर्ट ने माना कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सरकार को एक संतुलित और प्रभावी रेगुलेटरी फ्रेमवर्क तैयार करने पर विचार करना चाहिए।
जस्टिस गिरीश कठपालिया की एकल पीठ ने यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले दो फ्रीलांस पत्रकारों पर कथित हमले के आरोपियों को नियमित जमानत दी गई। हाई कोर्ट ने कहा कि डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। ऐसे में कई लोग बिना किसी पेशेवर प्रशिक्षण, नैतिक समझ या जवाबदेही के खुद को पत्रकार बताकर रिपोर्टिंग करने लगते हैं।

