KGBV शिक्षकों को बड़ी राहत : हाईकोर्ट ने 17 हजार रुपये मानदेय देने का दिया आदेश, चार महीने में पद सृजित करे सरकार

लखनऊ, 30 अक्टूबर। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) में शिक्षकों को वर्षों तक संविदा पर रखकर, उनके लिए पद सृजित किए बिना व नियमित शिक्षकों के समान वेतनमान दिए बिना काम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध जबरन श्रम के समान है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने कहा कि शिक्षकों को दिया जा रहा मानदेय अर्द्धकुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित पारिश्रमिक से भी कम है और इसे मानदेय कहना क्रूर मजाक है।

इन टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने राज्य सरकार को चार माह के भीतर केजीबीवी में शिक्षकों के पद स्वीकृत अथवा सृजित करने तथा उनकी सेवा शर्तें नियमित शिक्षकों के समान बनाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचियों और उनके समान स्थिति वाले अन्य शिक्षकों के नियमितीकरण के दावों पर उनकी शैक्षिक योग्यता और सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए कानून के अनुसार विचार किया जाए। यह आदेश अर्चना बुद्ध व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिया।

याचियों की ओर से अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने पक्ष रखा। अपने आदेश में कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक राज्य सरकार आवश्यक कदम नहीं उठा लेती, तब तक केजीबीवी में कार्यरत सभी शिक्षकों को निर्णय की तारीख से 17 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए। उन्हें बच्चों के निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 24(2) के तहत सेवा संबंधी संरक्षण भी मिलेगा। न्यायालय ने कहा कि सरकार को केजीबीवी शिक्षकों की सेवा शर्तें तय करनी होंगी, ये शर्तें इंटरमीडिएट स्तर तक के नियमित शिक्षकों की सेवा शर्तों के समान होनी चाहिए।

न्यायालय ने कहा कि यह व्यवस्था सिर्फ याचियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रदेश के सभी केजीबीवी शिक्षकों पर लागू होगी। शिक्षकों के मानदेय अथवा वेतन में समय-समय पर संशोधन कर उसे राज्य के सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन एवं परिलब्धियों के अनुरूप लाने का भी निर्देश दिया गया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को सहमति के अनुसार खर्च में अपना हिस्सा देना होगा।

हालांकि, राज्य सरकार यह कहकर आदेश के अनुपालन से इनकार नहीं कर सकती कि केंद्र से धनराशि स्वीकृत नहीं हुई है। न्यायालय ने कहा कि केजीबीवी योजना का उद्देश्य वंचित वर्गों, विशेषकर बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शिक्षकों को वर्षों तक असुरक्षित और अपर्याप्त वेतन पर काम कराना संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

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