प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया राजा भोज का 1000 साल पुराना संस्कृत श्लोक, जानिए क्या है इसका गहरा संदेश

नई दिल्ली, 30 अक्टूबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर संस्कृत का एक सुभाषित साझा किया। इसमें शास्त्रज्ञान, बुद्धिमत्ता, नैतिक आचरण और कर्मकुशलता के समन्वय को सफलता का आधार बताया गया है। राजा भोज की ओर से रचित प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ में शामिल इस श्लोक के जरिए पीएम मोदी ने ज्ञान को व्यवहार और कर्म से जोड़ने का संदेश दिया है।

प्रधानमंत्री ने जो संस्कृत श्लोक साझा किया, वह इस प्रकार है…

“शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं क्रिययान्वितम्।
लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्॥”

इसका भावार्थ है कि मनुष्य के भीतर शास्त्रों का ज्ञान, कर्म करने की क्षमता, बुद्धिमत्ता और श्रेष्ठ चरित्र होना चाहिए। इन सभी गुणों का व्यावहारिक जीवन में समन्वय ही उसे योग्य और सफल बनाता है। व्यक्ति को अपने लक्ष्य, उसे प्राप्त करने के सही तरीकों और शास्त्रों में बताए गए सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए।

राजा भोज के वास्तुशास्त्र ग्रंथ से लिया गया है श्लोक

यह संस्कृत सुभाषित मालवा के प्रतापी राजा भोज द्वारा रचित प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ से लिया गया है। ग्रंथ के 44वें अध्याय के दूसरे श्लोक में एक कुशल वास्तुविद के आवश्यक गुणों और विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। राजा भोज के अनुसार, एक अच्छे वास्तुविद के पास केवल किताबी ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे व्यावहारिक कार्यों का अनुभव, तेज बुद्धि और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसके साथ ही उसका चरित्र श्रेष्ठ और अपने कार्य के प्रति समर्पण होना जरूरी है।

ज्ञान के साथ आचरण और कर्म भी जरूरी

इस श्लोक का व्यापक संदेश यह है कि वास्तविक विद्वता केवल शास्त्रों को पढ़ने या ज्ञान अर्जित करने तक सीमित नहीं होती। व्यक्ति के विचार, चरित्र और व्यवहार में भी उसके ज्ञान की झलक दिखनी चाहिए। जो व्यक्ति अपने ज्ञान को कर्म में उतारता है और नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ता है, वही वास्तव में योग्य कहलाता है।

श्लोक में लक्ष्य, लक्षण और शास्त्रनिष्ठा के महत्व को भी रेखांकित किया गया है। इसका आशय है कि किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सही दिशा, स्पष्ट सिद्धांत और प्रभावी कार्यान्वयन जरूरी हैं। ज्ञान, विवेक और कर्म का संतुलन ही व्यक्ति को सफलता के साथ सार्थक जीवन की ओर ले जाता है।

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