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बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने दिसम्बर में स्वदेश लौटेंगी, बोलीं- ‘मुझे जान की परवाह नहीं, खुद सरेंडर करूंगी’

बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना ने दिसम्बर में स्वदेश लौटेंगी, बोलीं- ‘मुझे जान की परवाह नहीं, खुद सरेंडर करूंगी’

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नई दिल्ली, 10 जुलाई। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री व अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना ने शुक्रवार को एलान किया कि वह आगामी दिसम्बर में स्वदेश लौटेंगी। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि स्वदेश वापसी पर उनकी जान का खतरा है, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं और वह स्वेच्छा से बांग्लादेश लौटकर वहां अदालत में आत्मसमर्पण करेंगी।

उग्र छात्र आंदोलन के बीच तख्तापलट के बाद 5 अगस्त, 2024 से शेख हसीना ने भारत में ले रखी है शरण

उल्लेखनीय है कि डेढ़ दशक के दौरान चार बार प्रधानमंत्री रहीं 76 वर्षीय शेख हसीना को वर्ष 2024 में बांग्लादेश में उभरे उग्र छात्र आंदोलन के बीच तख्तापलट का सामना करना पड़ा था और पांच अगस्त, 2024 को पद से इस्तीफा देने के बाद देश छोड़कर भागना पड़ा था। तब से उन्होंने भारत में शरण ले रखी है। उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए एक विशेष इंटरव्यू में स्वदेश वापसी की सनसनीखेज जानकारी सार्वजनिक की। उन्होंने इंटरव्यू में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि बांग्लादेश लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है या उनकी हत्या भी की जा सकती है, इसके बावजूद उन्हें स्वदेश लौटना ही होगी और वह खुद सरेंडर करेंगी।

वहीं ढाका प्रशासन लगातार भारत से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। इसपर भारत ने कहा है कि वह मौजूदा न्यायिक और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत इस अनुरोध की जांच कर रहा है। हालांकि अब हसीना ने कहा है कि वह प्रत्यर्पण का इंतजार करने के बजाय खुद स्वेच्छा से वापस जाकर सरेंडर करेंगी।

शेख हसीना को सख्त कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा

इसमें कोई दो राय नहीं कि शेख हसीना को बांग्लादेश लौटते ही सख्त कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा। वह किसी भी रास्ते से बांग्लादेश में प्रवेश करेंग, उन्हें इमिग्रेशन या सीमा अधिकारियों द्वारा तुरंत हिरासत में ले लिया जाएगा। हिरासत में लिए जाने के तुरंत बाद उन्हें संबंधित अदालतों के समक्ष पेश किया जाएगा। एक बार गिरफ्तारी के बाद शेख हसीना जेल में रहकर ही अपने खिलाफ लंबित कई आपराधिक मामलों और अपीलों का सामना करेंगी।

अदालत सुना चुकी है मौत की सजा, अपील की समयसीमा भी खत्म

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बांग्लादेश की युद्ध अपराध अदालत शेख हसीना की गैर-मौजूदगी में पिछले वर्ष नवम्बर में उन्हें मौत की सजा सुना चुकी है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहते उन पर छात्र आंदोलन के दौरान जानलेवा काररवाई का आदेश देने का आरोप है। बांग्लादेशी कानून के मुताबिक यदि किसी व्यक्ति को उसकी गैर-मौजूदगी में दोषी ठहराया जाता है तो उसे फैसले के 30 दिनों के भीतर आत्मसमर्पण करना होता है और अपील दायर करनी होती है। शेख हसीना के मामले में यह 30 दिनों की समयसीमा पहले ही खत्म हो चुकी है। इस सजा को अदालत में चुनौती देना कानूनी रूप से अब और अधिक जटिल हो गया है।

छात्र आंदोलन के दौरान जानलेवा काररवाई का आदेश देने का आरोप

यदि शेख हसीना की सजा बरकरार रहती है और अदालत द्वारा उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाता है तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें या तो लंबी जेल काटनी होगी या फिर फांसी दी जा सकती है बशर्ते न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सजा को पलटा या बदला न जाए। इस फैसले से अलग शेख हसीना के खिलाफ देश में जमीन से जुड़े अपराधों और अन्य आरोपों सहित कई अलग आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट भी एक्टिव हैं। हालांकि शेख हसीना ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है।

जान का खतरा और राजनीतिक अस्थिरता

कानूनी पेचीदगियों से इतर शेख हसीना के बांग्लादेश लौटने पर उनकी जान को गंभीर खतरा हो सकता है। बांग्लादेश के भारी पोलराइज्ड राजनीतिक माहौल के बीच उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर भारी चिंताएं हैं। उनपर हमले का भी खतरे का मंडरा रहा है। फिलहाल शेख हसीना ने इंटरव्यू में कहा, ‘मेरे पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर जबर्दस्त अत्याचार किया जा रहा है। यदि मौत आती है तो मैं चाहती हूं कि वह मेरी अपनी मातृभूमि पर आए, जहां मेरे माता-पिता दफन हैं और जहां उनका खून बहा था।

अदालत को तमाशा साबित करना चाहती हूं

तमाम जानलेवा जोखिमों के बावजूद शेख हसीना ने कहा कि वह निर्वासन में रहने के बजाय बांग्लादेश में मामलों का सामना करना चाहती हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं न्याय में विश्वास करती हूं और मुझे लगता है कि एक बार कार्यवाही शुरू होने के बाद लोगों को स्पष्ट हो जाएगा कि यह अदालत कितनी बकवास है। मैं यही साबित करना चाहती हूं। हो सकता है कि उन्होंने मुझे दोषी ठहरा दिया हो और मैं शायद चुनाव न लड़ पाऊं। लेकिन वे अवामी लीग को क्यों निलंबित कर रहे हैं? अगर हमने बुरा किया है तो जनता को फैसला करने दें।’

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