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Ram Mandir : चंदा गबन मामले में निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, ट्रस्ट के पुनर्गठन और फोरेंसिक ऑडिट की मांग

Ram Mandir : चंदा गबन मामले में निर्मोही अखाड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, ट्रस्ट के पुनर्गठन और फोरेंसिक ऑडिट की मांग

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नई दिल्ली,19 जुलाई। अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से जुड़े कथित चंदा गबन मामले और मंदिर प्रबंधन को लेकर निर्मोही अखाड़ा ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अखाड़े ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन, ट्रस्ट के वित्तीय लेनदेन की स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट और मंदिर प्रबंधन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अदालत से आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की है।

20 जुलाई को प्रस्तावित है सुनवाई

याचिका में कथित दान गबन और मंदिर प्रबंधन से जुड़े मामलों की विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने की मांग का भी उल्लेख किया गया है। इस संबंध में दायर कुछ याचिकाओं पर 20 जुलाई को सुनवाई प्रस्तावित है।

ट्रस्ट के गठन और संचालन पर उठाए सवाल

निर्मोही अखाड़े का कहना है कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया था। अखाड़े का आरोप है कि फैसले की भावना के अनुरूप ट्रस्ट का गठन और संचालन नहीं किया गया। याचिका में मांग की गई है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित किया जाए और उसके सभी वित्तीय व संपत्ति संबंधी लेनदेन की स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराई जाए, ताकि किसी भी संभावित अनियमितता की निष्पक्ष जांच हो सके।

दान और बहुमूल्य वस्तुओं के कथित गबन का भी जिक्र

अखाड़े ने हाल ही में सामने आए श्रद्धालुओं के दान और बहुमूल्य वस्तुओं के कथित गबन के आरोपों का भी हवाला दिया है। याचिका के अनुसार, इन आरोपों की जांच के लिए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया है, इसलिए ट्रस्ट के वित्तीय रिकॉर्ड और संपत्तियों की भी व्यापक जांच कराई जानी चाहिए।

प्रतिनिधित्व और महंत के चयन पर आपत्ति

निर्मोही अखाड़े ने ट्रस्ट में अपने प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उसका कहना है कि अखाड़े को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की भावना के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला। साथ ही महंत दिनेंद्र दास के नामांकन पर भी आपत्ति जताते हुए कहा गया है कि उनका चयन निर्धारित प्रक्रिया के तहत नहीं किया गया।

मूर्ति स्थापना को लेकर भी उठाया मुद्दा

याचिका में गर्भगृह में नई मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठाए गए हैं। अखाड़े का कहना है कि इससे मूल विवाद की स्थिति प्रभावित हुई है। इसलिए वर्ष 1950 और 1982 से स्थापित मूल विग्रहों को पुनः गर्भगृह में स्थापित करने का निर्देश दिया जाए।

2019 के फैसले को नहीं दी चुनौती

निर्मोही अखाड़े ने स्पष्ट किया है कि उसकी याचिका सुप्रीम कोर्ट के 2019 के ऐतिहासिक फैसले को चुनौती नहीं देती। उसका उद्देश्य केवल फैसले के प्रभावी क्रियान्वयन, ट्रस्ट की जवाबदेही, पारदर्शिता और मंदिर प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायालय से आवश्यक निर्देश प्राप्त करना है।

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