PM Modi Sanskrit Shlok: पीएम मोदी ने साझा किया नया सुभाषित, बोले- निरंतर साधना और प्रयास से निखरती है प्रतिभा
नई दिल्ली, 4 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक प्रेरणादायक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए युवाओं को ज्ञान, साधना और निरंतर प्रयास का संदेश दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि लगातार मेहनत और साधना से व्यक्ति की प्रतिभा निखरती है और आज भारत के युवा इन्हीं गुणों के बल पर दुनिया भर में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं।
युवाओं की सफलता को बताया निरंतर साधना का परिणाम
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में लिखा कि “निरंतर प्रयास और साधना से हमारी प्रतिभा और निखरती है। आज हमारे युवा इन्हीं गुणों को आत्मसात कर दुनियाभर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं।”
इसके साथ ही उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक भी साझा किया-
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥”
जानिए श्लोक का अर्थ
इस श्लोक का अर्थ है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कोई दूसरा साधन नहीं है। जो व्यक्ति कर्मयोग और साधना के माध्यम से अपने अंतःकरण को शुद्ध कर लेता है, वह उचित समय आने पर परम ज्ञान का अनुभव स्वयं अपने भीतर करता है।
सोमवार को दिया था धैर्य और कर्म का संदेश
इससे एक दिन पहले सोमवार को भी प्रधानमंत्री मोदी ने संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने का संदेश दिया था। उन्होंने लिखा था-
“त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः।
याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव।”
इसका आशय है कि भाग्य प्रतिकूल होने पर भी व्यक्ति को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। जिस प्रकार समुद्र के बीच जहाज टूट जाने पर भी एक कुशल नाविक हिम्मत नहीं हारता और बचने के लिए प्रयास करता रहता है, उसी तरह मनुष्य को भी कठिन समय में कर्म करते रहना चाहिए।
गुरु पूर्णिमा पर भी साझा किया था प्रेरक संदेश
प्रधानमंत्री मोदी इससे पहले 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भी संस्कृत सुभाषित साझा कर देशवासियों को शुभकामनाएं दी थीं।उन्होंने लिखा था कि गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि अपने शिष्यों में सकारात्मक ऊर्जा, अच्छे विचार और संस्कारों का भी संचार करते हैं।
इसके साथ उन्होंने यह श्लोक साझा किया था-
“प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा।
शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥”
इसका अर्थ है कि जो प्रेरणा दे, सही दिशा दिखाए, ज्ञान प्रदान करे, सत्य का बोध कराए और आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करे, वही गुरु के छह स्वरूप माने गए हैं।
