Monsoon 2026: विदाई के साथ बढ़ी पानी और बिजली संकट की चिंता, 178 बांधों में घटा जलस्तर; El Nino से बढ़ेगी चुनौती

नई दिल्ली,1 अक्टूबर। दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 की विदाई के साथ देश में पानी और बिजली की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। भारत में जून से सितंबर के बीच इस बार सामान्य से करीब 12.6 से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। यह 2001 के बाद सबसे कम मानसूनी बारिश वाले वर्षों में शामिल है।  हालांकि राष्ट्रीय औसत पूरी तस्वीर नहीं बताता, क्योंकि कई क्षेत्रों में बारिश बेहद कम रही, जबकि कुछ इलाकों में भारी बारिश दर्ज की गई। दूसरी ओर, सितंबर के अंतिम सप्ताह तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण करीब 70 प्रतिशत क्षमता के आसपास रह गया था। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार यह स्तर पिछले साल और दीर्घकालिक औसत की तुलना में कम है। दक्षिण भारत के जलाशयों पर इसका असर विशेष रूप से दिखाई दे रहा है।

मानसून की कमी से बढ़ी जल संकट की चिंता

इस साल मानसून का वितरण काफी असमान रहा। देश के कई हिस्सों में लंबे समय तक बारिश की कमी बनी रही। भारत के सूखा निगरानी आंकड़ों के अनुसार सितंबर के तीसरे सप्ताह में देश के 51 प्रतिशत से अधिक भूभाग को D0 या उससे खराब सूखे की श्रेणी में रखा गया था। यह आंकड़ा बारिश की राष्ट्रीय कमी से अलग है और इसमें मिट्टी की नमी, रनऑफ और अन्य परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाता है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थिति विशेष रूप से गंभीर बनी हुई है। क्षेत्र में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 32-35 प्रतिशत कम रही। महाराष्ट्र सरकार ने 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया है, जिनमें मराठवाड़ा के 74 तालुका शामिल हैं।

178 प्रमुख जलाशयों में घटा पानी

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 178 प्रमुख जलाशयों में सितंबर के अंत तक कुल क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध था। यह करीब एक दशक के निचले स्तर के आसपास है। दक्षिण भारत के 92 प्रमुख जलाशयों में भंडारण करीब 50 प्रतिशत क्षमता तक रह गया, जबकि पिछले साल इसी समय यह करीब 87 प्रतिशत था। जलाशयों में कम पानी का सीधा असर पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। खासकर ऐसे राज्य जहां खेती और स्थानीय जलापूर्ति बड़े जलाशयों पर निर्भर है, वहां आने वाले महीनों में जल प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

पनबिजली उत्पादन पर भी पड़ा असर

कम बारिश और जलाशयों में घटते भंडार का असर पनबिजली उत्पादन पर भी दिखाई दिया है। जून 2026 में देश का हाइड्रोपावर उत्पादन पिछले साल के मुकाबले करीब 21 प्रतिशत कम रहा। यह गिरावट फरवरी 2024 के बाद सबसे बड़ी गिरावटों में शामिल थी। पनबिजली उत्पादन में कमी की भरपाई के लिए बिजली व्यवस्था को कोयला आधारित संयंत्रों पर अधिक निर्भर रहना पड़ा। जून में हाइड्रो उत्पादन में गिरावट के साथ कोयला आधारित बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज की गई। भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में हाइड्रोपावर की हिस्सेदारी करीब 11 प्रतिशत है। इसलिए लंबे समय तक जलाशयों में कम पानी रहने की स्थिति में बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

फरवरी 2027 तक बना रह सकता है El Nino

मौसम की चुनौती यहीं खत्म होती नजर नहीं आ रही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के सितंबर 2026 के अपडेट के मुताबिक El Nino के फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत है। संगठन ने इसके साल के अंत तक बहुत मजबूत होने और वर्ष के अंत के आसपास चरम पर पहुंचने का अनुमान जताया है। WMO के अनुसार मजबूत El Nino दुनिया के कई हिस्सों में तापमान और बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि किसी एक देश या क्षेत्र पर इसका असर कितना होगा, यह सिर्फ El Nino की तीव्रता से तय नहीं होता। अन्य समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत सरकार के अनुसार भी 2026 के दौरान El Nino के मजबूत होने की संभावना जताई गई थी। IMD ने स्पष्ट किया है कि इसके प्रभाव क्षेत्रीय परिस्थितियों और अन्य जलवायु कारकों पर निर्भर करेंगे।

सर्दियों और अगले साल की गर्मी पर भी नजर

El Nino के कारण आगामी महीनों में तापमान और बारिश के सामान्य पैटर्न में बदलाव की आशंका बनी हुई है। विशेषज्ञों ने सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत गर्म परिस्थितियों की संभावना जताई है, हालांकि किसी क्षेत्र में शीतलहर या गर्मी की स्थिति का सटीक अनुमान स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर ही लगाया जा सकता है। ऐसे में मराठवाड़ा, विदर्भ, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश जैसे कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं पंजाब और हरियाणा जैसे अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई व्यवस्था वाले क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है। कुल मिलाकर, 2026 के कमजोर और असमान मानसून ने पानी के भंडार, सिंचाई और पनबिजली उत्पादन के सामने चुनौती बढ़ा दी है। अब आने वाले महीनों में पूर्वोत्तर मानसून, सर्दियों की बारिश और El Nino की स्थिति यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि जल संकट कितना गहरा होता है।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular