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पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम से पहले नया ड्रामा : निर्वाचन आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची TMC

पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम से पहले नया ड्रामा : निर्वाचन आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची TMC

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नई दिल्ली, 1 मई। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में परिणाम से पहले अब सुप्रीम कोर्ट की एंट्री हो गई है। दरअसल, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई के लिए एक अर्जी देकर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत मतगणना पर्यवेक्षक के तौर पर केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को नियुक्त करने का निर्णय लिया गया था। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने इस मामले पर शनिवार को तत्काल सुनवाई करने के निर्देश दिए।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने खारिज की थी टीएमसी की याचिका

टीएमसी की ओर से याचिका की तत्काल सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तब खटखटाया गया, जब कलकत्ता हाई कोर्ट ने उसकी वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें वोट-गिनती केंद्रों पर सुपरवाइज़र के तौर पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

जस्टिस कृष्णा राव ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के बजाय केंद्र सरकार या PSU कर्मचारियों में से काउंटिंग सुपरवाइज़र और सहायक नियुक्त करने के EC के फैसले में कोई गैर-कानूनी बात नहीं है। कोर्ट ने कहा था, ‘काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट की नियुक्ति राज्य सरकार या केंद्र सरकार में से किसी से भी करने का अधिकार EC के कार्यालय का ही है।’

यह याचिका टीएमसी ने दायर की थी, जिसमें पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा 30 अप्रैल को जारी एक निर्देश को चुनौती दी गई थी। इस निर्देश में कहा गया था कि हर टेबल पर मौजूद काउंटिंग सुपरवाइजर या सहायक में से कम से कम एक व्यक्ति केंद्र सरकार या PSU का कर्मचारी होना चाहिए। टीएमसी की ओर से पेश वकील कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि यह निर्देश बिना किसी अधिकार क्षेत्र के जारी किया गया था और यह केवल कोरी आशंका पर आधारित था।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई वाली पार्टी ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि केंद्र सरकार के कर्मचारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) से प्रभावित हो सकते हैं, जो केंद्र में सत्ता में है। हालांकि, अदालत ने इस आशंका को खारिज कर दिया और मतगणना प्रक्रिया के दौरान कई हितधारकों की मौजूदगी का हवाला दिया।

हाई कोर्ट ने कहा था, ‘सिर्फ काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट ही काउंटिंग रूम में नहीं होंगे। माइक्रो ऑब्जर्वर, चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के काउंटिंग एजेंट और काउंटिंग स्टाफ भी काउंटिंग रूम में मौजूद होंगे। इसलिए, याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप पर विश्वास करना असंभव है।’

चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि नियुक्तियां तय प्रक्रिया के अनुसार ही की गई थीं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कोई भी एक राजनीतिक पार्टी आयोग के फैसले लेने के तरीके पर सवाल नहीं उठा सकती। उन्होंने आगे कहा कि केंद्रीय कर्मचारियों को प्राथमिकता देने का मकसद पक्षपात के आरोपों को रोकना था।

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