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नेपाल का कैलाश मानसरोवर यात्रा में अड़ंगा! बालेन सरकार ने लिपुलेख पर भारत को लिखा प्रोटेस्ट नोट

नेपाल का कैलाश मानसरोवर यात्रा में अड़ंगा! बालेन सरकार ने लिपुलेख पर भारत को लिखा प्रोटेस्ट नोट

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काठमांडू, 3 मई। नेपाल में सत्तारूढ़ बालेंद्र शाह ‘बालेन’ सरकार ने लिपुलेख दर्रे से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के संचालन में अड़ंगा डालते हुए भारत व चीन को एक कूटनीतिक पत्र यानी डिप्लोमेटिक प्रोटेस्ट नोट भेजा है। इस पत्र में नेपाल ने लिपुलेख से कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा है कि यह इलाका उसकी भूमि का हिस्सा है और इस पर कोई भी गतिविधि स्वीकार नहीं है।

लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा स्वीकार्य नहीं

नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोकबहादुर पौडेल क्षेत्री ने साफ कर दिया है कि लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा चलाने की योजना पर उन्हें सख्त आपत्ति है। नेपाल का कहना है कि यह उसकी जमीन है और बिना उनकी मर्जी के वहां कोई गतिविधि नहीं होनी चाहिए।

पूरा नेपाल इस मुद्दे पर एकजुट – विदेश मंत्री शिशिर खनाल

इस मुद्दे पर नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बताया कि यह फैसला किसी एक नेता का नहीं है, बल्कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों से बातचीत करने के बाद ही यह ‘प्रोटेस्ट नोट’ भेजा गया है। यानी पूरा नेपाल इस मुद्दे पर एक सुर में बात कर रहा है।

हालांकि नेपाल की यह आपत्ति कोई नई नहीं है बल्कि इसकी जड़ 1816 की ‘सुगौली संधि’ में छिपी है। नेपाल सरकार का दावा है कि इस संधि के हिसाब से महाकाली नदी के पूर्व में पड़ने वाला लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का पूरा इलाका नेपाल का हिस्सा है। नेपाल इस बात पर पूरी तरह अडिग है कि ये जगहें उसके नक्शे का अभिन्न अंग हैं।

चिट्ठी में चेतावनी और पुराने दावों का दम

नेपाल ने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसमें साफ-साफ लिखा है कि उन्होंने अपना रुख भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक रास्तों से बता दिया है। नेपाल की बालेन सरकार का कहना है कि वे पहले भी कई बार भारत सरकार से कह चुके हैं कि इस इलाके में सड़क बनाना, व्यापार करना या तीर्थयात्रा जैसी कोई भी चीज न की जाए। लेकिन जब बात आगे बढ़ी, तो नेपाल ने अब औपचारिक विरोध दर्ज करा दिया है।

लिपुलेख और कालापानी को लेकर नेपाल अक्सर अपना दावा ठोकता रहा है

देखा जाए तो यह विवाद काफी पुराना है। नेपाल अक्सर लिपुलेख और कालापानी को लेकर अपना दावा ठोकता रहा है। लेकिन इस बार बालेन सरकार का अंदाज थोड़ा जुदा है क्योंकि उसने भारत के साथ-साथ चीन को भी लपेटे में ले लिया है। नेपाल का मानना है कि इस क्षेत्र से जुड़ी संवेदनशीलता को दोनों बड़े देशों को समझना चाहिए।

समझा जाता है कि आगामी दिनों जब कैलाश मानसरोवर की यात्रा शुरू होगी तो नेपाल का यह ‘प्रोटेस्ट नोट’ क्या मोड़ लेगा। फिलहाल तो नेपाल ने अपनी जमीन का हवाला देकर दिल्ली और बीजिंग की टेंशन बढ़ा दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत और चीन इस कूटनीतिक चिट्ठी का क्या जवाब देते हैं।

नेपाल के पीएम ओली ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात में लिपुलेख को लेकर जताई आपत्ति

पूर्व पीएम ओली ने भी लिपुलेख से भारत-चीन व्यापार पर जताई थी आपत्ति

स्मरण रहे कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने  पिछले वर्ष चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के दौरान भारत व चीन के बीच लिपुलेख से व्यापार फिर शुरू करने को लेकर आपत्ति जताई थी। तियानजिन में पिछले वर्ष अगस्त में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भागीदारी के दौरान ओली व शिनपिंग की मुलाकात के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि बैठक के दौरान ओली ने भारत व चीन के बीच हाल ही में लिपुलेख से व्यापार फिर शुरू करने पर हुई सहमति पर आपत्ति जताई।

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