मुंबई, 2 अक्टूबर। हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख का जन्म 2 अक्टूबर 1942 को मुंबई के सांता क्रूज में हुआ था। अपने लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने अभिनय, डांस और अपनी खास स्क्रीन मौजूदगी से दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई। हालांकि, उनका फिल्मी सफर हमेशा आसान नहीं रहा। करियर के शुरुआती दौर में उन्हें एक फिल्म से यह कहकर बाहर कर दिया गया था कि वह ‘स्टार मैटीरियल’ नहीं हैं। उस फिल्म के लिए उन्हें बतौर साइनिंग अमाउंट महज 11 रुपये मिले थे।
बचपन से था डांस का शौक
आशा पारेख को बचपन से ही डांस में दिलचस्पी थी। महज आठ साल की उम्र में उन्होंने स्कूल के एक कार्यक्रम में डांस किया था। उन्होंने कथक और भरतनाट्यम की ट्रेनिंग भी ली। उनके डांस से प्रभावित होकर फिल्मकारों का ध्यान उनकी ओर गया। निर्देशक बिमल रॉय ने उन्हें एक स्टेज कार्यक्रम में डांस करते देखा और बाल कलाकार के तौर पर फिल्म ‘बाप बेटी’ में काम करने का मौका दिया। इसके बाद वह ‘मां’, ‘आसमान’ और ‘श्री चैतन्य महाप्रभु’ जैसी फिल्मों में भी बाल कलाकार के रूप में नजर आईं।
11 रुपये मिले, फिर फिल्म से कर दिया गया बाहर
आशा पारेख के करियर का एक अहम मोड़ विजय भट्ट की फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ से जुड़ा है। उन्हें इस फिल्म में बतौर हीरोइन साइन किया गया था और साइनिंग अमाउंट के तौर पर 11 रुपये दिए गए थे। आशा पारेख इस मौके को लेकर काफी उत्साहित थीं, लेकिन कुछ दिनों की शूटिंग के बाद उन्हें फिल्म से हटा दिया गया। उनके अनुसार, उन्हें बताया गया कि वह ‘स्टार मैटीरियल’ नहीं हैं। उनकी जगह अमीता को फिल्म में लिया गया। यह घटना उनके लिए बड़ा झटका थी।
‘दिल देके देखो’ ने बदल दी किस्मत
फिल्म से बाहर होने के कुछ समय बाद आशा पारेख को फिल्ममेकर नासिर हुसैन ने ‘दिल देके देखो’ के लिए स्क्रीन टेस्ट का मौका दिया। उन्होंने टेस्ट दिया और फिल्म में उन्हें शम्मी कपूर के साथ मुख्य भूमिका मिल गई। 1959 में रिलीज हुई ‘दिल देके देखो’ सफल रही और आशा पारेख को बतौर अभिनेत्री पहचान मिली। इसके बाद उनके करियर ने रफ्तार पकड़ ली और उन्होंने हिंदी सिनेमा में एक के बाद एक यादगार फिल्मों में काम किया।
इन फिल्मों ने दिलाई खास पहचान
1960 और 1970 के दशक में आशा पारेख हिंदी सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्रियों में शामिल रहीं। उन्होंने ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘तीसरी मंजिल’, ‘लव इन टोक्यो’, ‘मेरे सनम’, ‘आए दिन बहार के’, ‘उपकार’, ‘कटी पतंग’, ‘आन मिलो सजना’, ‘कारवां’ और ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्मों में काम किया। फिल्म ‘कटी पतंग’ में उनके अभिनय को खास तौर पर सराहा गया और इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।
अभिनय के अलावा निर्देशन और प्रशासनिक भूमिकाएं भी निभाईं
आशा पारेख ने सिर्फ अभिनेत्री के तौर पर ही काम नहीं किया, बल्कि निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने टेलीविजन के लिए गुजराती सीरियल ‘ज्योति’ का निर्देशन किया और ‘कोरा कागज’ जैसे टीवी प्रोजेक्ट से भी जुड़ीं। वह सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (CINTAA) की अध्यक्ष भी रहीं। इसके अलावा 1998 से 2001 तक उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली।
पद्म श्री से दादा साहेब फाल्के पुरस्कार तक
आशा पारेख को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें 1992 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2002 में फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला। भारत सरकार ने उन्हें 2020 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की। यह सम्मान भारतीय सिनेमा में उनके लंबे और उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया।


