गोवा, 16 जुलाई। दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने नीट यूजी (NEET UG) पेपर लीक, छात्रों की आत्महत्या और शिक्षा व्यवस्था को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि देश के शिक्षा तंत्र और समाज के गहरे संकट का संकेत है। उन्होंने जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन और शिक्षाविद सोनम वांगचुक के अनशन का जिक्र करते हुए सरकार से संवाद की अपील की और वांगचुक से अनशन समाप्त करने का आग्रह किया। गोवा में मीडिया से बातचीत के दौरान आचार्य प्रशांत ने कहा कि इतने गंभीर मुद्दे पर त्वरित प्रतिक्रिया देने के बजाय उसके मूल कारणों को समझना जरूरी है।
’22 लाख छात्रों का सिर्फ पेपर नहीं, भरोसा टूटा’
आचार्य प्रशांत ने कहा कि 22 लाख अभ्यर्थियों के पीछे 22 लाख परिवारों की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। उन्होंने कहा कि कई छात्र दो से पांच साल तक कठिन तैयारी करते हैं, अपना बचपन, खेल और सामाजिक जीवन छोड़ देते हैं। ऐसे में जब उन्हें पेपर लीक की खबर मिलती है तो केवल परीक्षा नहीं, बल्कि ईमानदारी और मेहनत पर उनका विश्वास भी टूट जाता है। उन्होंने कहा कि जब युवाओं को यह महसूस होने लगता है कि मेहनत से ज्यादा पैसे और बेईमानी की कीमत है, तो उसका असर पूरी जिंदगी पर पड़ता है।
‘हर साल दोहराई जा रही घटनाओं ने युवाओं का विश्वास हिला दिया’
आचार्य प्रशांत ने कहा कि सरकार कार्रवाई करती है, गिरफ्तारियां होती हैं और कई बार परीक्षाएं दोबारा कराई जाती हैं, लेकिन हर साल होने वाली ऐसी घटनाओं ने युवाओं का बुनियादी भरोसा कमजोर कर दिया है। उन्होंने कहा कि भीतर से टूट जाना भी एक तरह का आत्मघात है, जिसका कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आता।
सोनम वांगचुक के समर्थन में कही यह बात
आचार्य प्रशांत ने सोनम वांगचुक को गंभीर और ईमानदार व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि उन्होंने लद्दाख जैसे कठिन क्षेत्र में शिक्षा के लिए उल्लेखनीय काम किया है। उन्होंने सरकार से अपील की कि लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए और केवल बातचीत के लिए किसी सम्मानित नागरिक को अपने प्राण दांव पर लगाने की नौबत नहीं आनी चाहिए।
‘सिर्फ सिस्टम नहीं, समाज भी जिम्मेदार’
आचार्य प्रशांत ने कहा कि पेपर लीक केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि पेपर तभी बिकता है जब कोई खरीदने वाला भी हो। उनके मुताबिक, लाखों अभ्यर्थियों और सीमित सीटों की होड़ ने ऐसा बाजार तैयार कर दिया है, जहां दलालों और भ्रष्टाचार के लिए जगह बन जाती है। उन्होंने कहा कि इस सोच को केवल दलालों या सरकारी तंत्र ने नहीं बनाया, बल्कि समाज, परिवार और प्रतिस्पर्धा की संस्कृति ने भी इसे बढ़ावा दिया है।
अभिभावकों से भी पूछा सवाल
आचार्य प्रशांत ने अभिभावकों से पूछा कि “एक साधारण और सुंदर बच्चे को आपने एंट्रेंस एग्जाम का प्रोजेक्ट कब बना दिया?” उन्होंने कहा कि यदि माता-पिता वास्तव में बच्चों से प्रेम करते हैं, तो उनकी आत्म-गरिमा को किसी एक परीक्षा के परिणाम से नहीं जोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका कमाना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाना भी होना चाहिए। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में शिक्षा को व्यक्तित्व विकास के बजाय प्रतिस्पर्धा और दबाव का माध्यम बना दिया गया है।
‘हमें आत्म की सामूहिक शिक्षा चाहिए’
आचार्य प्रशांत ने कहा कि भारत को केवल व्यावसायिक शिक्षा नहीं, बल्कि ‘मास एजुकेशन ऑफ द सेल्फ’ यानी आत्मबोध आधारित शिक्षा की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक शिक्षा के मूल्यों और समाज की सोच में बदलाव नहीं होगा, तब तक ऐसे संकट बार-बार सामने आते रहेंगे।

