NALSAR विवाद पर CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान, बोले- ‘निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया’, जानें पूरा मामला

नई दिल्ली, 17 अगस्त : चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने साफ किया है कि उन्होंने हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के दीक्षांत समारोह में शामिल होने का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में उनके समारोह में जाने का सवाल ही नहीं उठता। NALSAR के छात्रों के विरोध से शुरू हुआ यह विवाद अब BCI और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

CJI सूर्यकांत ने NALSAR जाने पर क्या कहा?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत से जब पूछा गया कि क्या वह हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के आगामी दीक्षांत समारोह में शामिल होंगे, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने विश्वविद्यालय का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया है। इसलिए वहां जाने का प्रश्न नहीं उठता। CJI के इस बयान को फिलहाल औपचारिक तौर पर निमंत्रण ठुकराना नहीं कहा जा सकता। हालांकि, इससे यह स्पष्ट है कि उन्होंने NALSAR के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने के लिए अपनी सहमति नहीं दी है।

NALSAR के छात्रों ने क्यों जताई थी आपत्ति?

दरअसल, NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के एक वर्ग ने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से निमंत्रण पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। छात्रों की आपत्ति सुप्रीम कोर्ट की कुछ हालिया कार्यवाहियों और CJI सूर्यकांत की टिप्पणियों से जुड़ी थी। खास तौर पर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस कार्रवाई से जुड़े मामले की सुनवाई को लेकर CJI की टिप्पणियां विवाद का केंद्र बनीं।

विवाद NLSIU बेंगलुरु तक पहुंचा

NALSAR का विवाद अब बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (NLSIU) तक भी पहुंच गया। NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों के एक समूह ने CJI सूर्यकांत और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के वहां होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने पर आपत्ति जताई। रिपोर्ट के मुताबिक 702 छात्रों ने इस संबंध में विरोध दर्ज कराया। इस घटनाक्रम ने देश की प्रमुख लॉ यूनिवर्सिटीज में छात्र असहमति, अकादमिक स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

BCI ने NALSAR से मांगी थी छात्रों की रिपोर्ट

छात्रों के अभियान के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने NALSAR के कुलपति से उन छात्रों और अन्य लोगों के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी थी, जिन्होंने CJI को दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किए जाने के खिलाफ अभियान शुरू करने, उसे आयोजित करने या छात्रों को लामबंद करने में भूमिका निभाई थी। BCI ने यह भी कहा था कि मामले के तथ्यों की जांच जरूरी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं Advocates Act के तहत निर्धारित पेशेवर आचरण के मानकों का उल्लंघन तो नहीं हुआ।

BCI के फैसले पर मचा था विवाद

मामला आगे बढ़ने पर BCI ने NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के राज्य बार काउंसिल में नामांकन को रोकने का निर्देश दिया था। इस कदम की व्यापक आलोचना हुई, क्योंकि कार्रवाई का असर पूरे बैच पर पड़ रहा था, जबकि विवाद छात्रों के एक वर्ग के अभियान से जुड़ा था। इसके बाद BCI ने अपना नामांकन रोकने वाला निर्देश वापस ले लिया। मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब सुप्रीम कोर्ट ने BCI की कार्रवाई और उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों के अधिकार पर क्या कहा?

NALSAR विवाद की सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने छात्रों के विरोध के अधिकार पर भी जोर दिया। उन्होंने संकेत दिया कि छात्रों को अपनी बात रखने और असहमति जताने से नहीं रोका जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने BCI से इस मामले में जवाब भी मांगा है। इस पूरे विवाद ने अब एक बड़े सवाल को जन्म दिया है—क्या किसी संवैधानिक या न्यायिक पदाधिकारी के खिलाफ छात्रों की शांतिपूर्ण असहमति को पेशेवर आचरण के उल्लंघन के तौर पर देखा जा सकता है? यही सवाल NALSAR विवाद को महज एक दीक्षांत समारोह के विवाद से आगे ले गया है।

क्या है पूरा NALSAR विवाद?

संक्षेप में, विवाद की शुरुआत NALSAR के छात्रों द्वारा CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति से हुई। इसके बाद BCI ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए छात्रों और अभियान से जुड़े लोगों की जानकारी मांगी। BCI की कार्रवाई पर सवाल उठे और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। अब CJI सूर्यकांत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था। इसलिए फिलहाल उनके दीक्षांत समारोह में शामिल होने का सवाल ही नहीं है।

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