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सपा ने किया कांशीराम जयंती मनाने का एलान तो भड़कीं मायावती, बताया राजनीतिक नाटकबाजी

सपा ने किया कांशीराम जयंती मनाने का एलान तो भड़कीं मायावती, बताया राजनीतिक नाटकबाजी

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लखनऊ, 26 फरवरी। समाजवादी पार्टी (सपा) की तरफ से बीएसपी संस्थापक कांशीराम की जयंती पर ‘पीडीए दिवस’ मनाने की घोषणा के बाद सियासत तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी (सपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सपा पर तीखा हमला बोलते हुए उसे दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और बहुजन समाज विरोधी करार दिया है। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “बीएसपी संस्थापक कांशीराम की जयंती पर ‘पीडीए दिवस’ मनाने की घोषणा महज राजनीतिक नाटकबाजी है।” उन्होंने इसे उपेक्षित वर्गों के वोट हासिल करने के लिए दिखावा बताया।

मायावती ने कहा कि समाजवादी पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही बीएसपी और बहुजन महापुरुषों के सम्मान के खिलाफ रहा है। सपा का इतिहास दलितों और कमजोर वर्गों के साथ अन्याय और अत्याचार से जुड़ा रहा है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। 2027 के चुनाव को देखते हुए सपा की तरफ से ये किया जा रहा है। आज से पहले सपा ने इनको याद भी नहीं किया था। उन्होंने वर्ष 1993 के सपा-बसपा गठबंधन का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय भी दलितों पर अत्याचार रोकने की शर्तों का पालन नहीं किया गया।

मायावती ने 2 जून 1995 के लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड की याद दिलाते हुए आरोप लगाया कि उनके ऊपर जानलेवा हमला कराया गया, जो इतिहास में दर्ज है। उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। बसपा प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि कांशीराम के नाम पर बनाए गए जिलों और संस्थानों के नाम सपा सरकार ने बदल दिए। कांशीराम नगर, संत रविदास नगर और लखनऊ में स्थापित उर्दू-फारसी-अरबी विश्वविद्यालय सहित कई संस्थानों के नाम बदले गए, जो बहुजन समाज के सम्मान के खिलाफ है। साथ ही सहारनपुर में कांशीराम के नाम पर बने अस्पताल का नाम भी परिवर्तित किए जाने का आरोप लगाया।

मायावती ने सपा पर मुस्लिम विरोधी रवैया अपनाने का भी आरोप लगाया और कहा कि सपा सरकारों के दौरान हुए दंगों से भारी जानमाल का नुकसान हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि सपा और भाजपा एक-दूसरे की राजनीति को मजबूती देती रही हैं, जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ा है। मायावती ने अपील करते हुए कहा कि सपा को यह जवाब देना चाहिए कि कांशीराम के निधन पर राजकीय शोक क्यों घोषित नहीं किया गया।

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