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CJI सूर्यकांत ने खारिज की 2023 में जारी जेंडर हैंडबुक! बोले – वह रेप पीड़िता और आम लोगों के लिए मददगार नहीं

Revoi Editor
Last updated: February 11, 2026 2:26 pm
Revoi Editor
Published: February 11, 2026
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नई दिल्ली, 11 फरवरी। भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने वर्ष 2023 में जारी एक जेंडर हैंडबुक को तकरीबन खारिज कर दिया है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों और प्रचलित स्टीरियोटाइप सोच से निबटने के लिए कुछ नए शब्दों के इस्तेमाल की बात कही गई थी। उस हैंडबुक का मकसद जजों और वकीलों को जेंडर आधारित भेदभावपूर्ण और अपमानजनक शब्दों के बारे में संवेदनशील बनाना और उनकी मदद करना था।

हैंडबुक नहीं समझ सकती रेप पीड़िता

राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सीजेआई सूर्यकांत ने मंगलवार को कहा कि यह हैंडबुक कुछ ज्यादा ही तकनीकी और हार्वर्ड ओरिएंटेड है, जो रेप पीड़िता और आम लोगों के लिए मददगार नहीं है। गौरतलब है कि हार्वर्ड से शिक्षित पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पहल पर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘लिंग संबंधी रूढ़ियों से निबटने पर हैंडबुक’ प्रकाशित की थी।

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारी की पीठ ने कहा कि हैंडबुक में यौन उत्पीड़न के कई पहलुओं को फोरेंसिक अर्थ दिए गए हैं, जिन्हें रेप पीड़िता, उसके रिश्तेदार या आम लोग नहीं समझ सकते। उस हैंडबुक में स्टीरियोटाइप शब्दों की जगह किन शब्दों का इस्तेमाल करने की बात कही गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अकादमी से इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले की असंवेदनशीलता पर स्वत: संज्ञान लिया, जिसमें यह फैसला सुनाया गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और ‘पायजामा की डोरी ढीली करना’ रेप का प्रयास नहीं माना जाता। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा – यह हैंडबुक बहुत ज्यादा हार्वर्ड-केंद्रित है।

पीठ ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने, दिशानिर्देश तैयार करने और सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट पेश करने के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और वकीलों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा-हम इसे और बेहतर बनाने के लिए एमिकस क्यूरी शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फूलका सहित वकीलों की सहायता लेंगे।

पीठ में बैठे जजों को उपदेश देने का फायदा नहीं, उन्हें अकादमी में ट्रेनिंग मिलनी चाहिए

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक अकादमी इसे हाईकोर्ट के जजों के लिए स्टडी मैटीरियल बनाए, जिन्हें पीठ में बुलाया जा सकता है और यौन उत्पीड़न के मामलों से निबटने के दौरान आवश्यक संवेदनशीलता के बारे में ट्रेनिंग दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में बैठे हाईकोर्ट के जजों को उपदेश देने का कोई लाभ नहीं है। उन्हें अकादमी में ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।

पीठ ने रद कर दिया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला

पीठ ने इसी क्रम में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च, 2025 के उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें अपराध की तैयारी और अपराध करने के प्रयास में अंतर किया गया था और निचली अदालत को दोनों आरोपितों के खिलाफ काररवाई करने का आदेश दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले से भारी आक्रोश फैल गया था और पिछले वर्ष 26 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले का स्वतः संज्ञान लेते हुए इस पर रोक लगा दी थी। साथ ही हाईकोर्ट के जज द्वारा दिखाई गई असंवेदनशीलता पर अपनी नाराजगी जताई थी।

हैंडबुक पर तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ ने क्या कहा था

इस हैंडबुक की प्रस्तावना में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने लिखा था – यह हैंडबुक महिलाओं के बारे में प्रचलित रूढ़ियों की पहचान करती है, जिनमें से कई का इस्तेमाल अतीत में अदालतों द्वारा किया गया है। यह दर्शाती है कि वे क्यों गलत हैं और किस प्रकार कानून के प्रयोग को विकृत कर सकती हैं।

इसका मकसद अतीत के निर्णयों की आलोचना करना या उन पर संदेह करना नहीं है, बल्कि केवल यह दिखाना है कि अनजाने में रूढ़ियों का उपयोग कैसे किया जा सकता है। अंत में, यह प्रमुख कानूनी मुद्दों पर वर्तमान सिद्धांत को संक्षेप में प्रस्तुत करती है जो कुछ मामलों, विशेष रूप से यौन हिंसा से संबंधित मामलों का निर्णय करते समय प्रासंगिक हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की जेंडर हैंडबुक की अहम बातें

सुप्रीम कोर्ट की हैंडबुक अगस्त, 2023 में देश के सभी कोर्टों के लिए जारी की गई थी। हैंडबुक में समाज में प्रचलित स्टीरियोटाइप सोच और उसके विकल्प के रूप में दूसरे शब्दों का इस्तेमाल करने की बात कही गई है। इसका नाम है -Handbook on Combating Gender Stereotypes। हैंडबुक में स्टीरियोटाइप सोच और हकीकत के बारे में भी बताया गया है।

  • स्टीरियोटाइप सोच : आमतौर पर महिलाएं सेक्शुअल असॉल्ट या रेप के झूठे आरोप लगाती हैं।
  • सच्चाई : महिलाओं को सेक्शुअल असॉल्ट या रेप के बारे में रिपोर्ट लिखाने में परिवार का सपोर्ट नहीं मिलता है। महिला की बात पर जल्दी यकीन नहीं किया जाता।
  • स्टीरियोटाइप सोच : ट्रांसजेंडर लोगों के साथ रेप नहीं किया जा सकता है।
  • सच्चाई : ट्रांसजेंडर से भी रेप हो सकता है। उनसे बुरा बर्ताव होता है और सेक्शुअल वॉयलेंस का खतरा ज्यादा होता है।
  • स्टीरियोटाइप सोच : महिलाएं इमोशनल होती हैं, उनमें तर्क करने या फैसले लेने की क्षमता नहीं होती है।
  • सच्चाई : किसी भी व्यक्ति का जेंडर उसकी तर्क करने की क्षमता या सोच पर असर नहीं डालता।
  • स्टीरियोटाइप सोच : घर के सभी कामकाज महिलाओं को ही करना चाहिए।
  • सच्चाई : जेंडर कोई भी हो, हर व्यक्ति घर के कामकाज बेहतर तरीके से कर सकता है।
  • स्टीरियोटाइप सोच : अनमैरिड महिलाएं लाइफ में अहम फैसले नहीं ले पाती हैं।
  • सच्चाई : शादी करने से किसी में फैसले लेने की क्षमता नहीं आ जाती है।

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