By Varsha Pargat
पश्चिम बंगाल के चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो गए. अब सभी की नज़रें 4 में पर टिकी है जब चुनाव परिणाम घोषित होंगे. सभी भारतीयों की यह उम्मीद है कि वहां सत्ता परिवर्तन होगा और तुष्टिकरण की राजनीति का अंत होगा. आजादी के बाद से ही पश्चिम बंगाल तुष्टिकरण का शिकार बन रहा है.
भारत के विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी पश्चिम बंगाल ने भी झेली . नरसंहार , अत्याचार और क्रूरता का साक्षी रहा है पश्चिम बंगाल. “डायरेक्ट एक्शन डे” का प्रचंड कहकर कोलकाता ने सहन किया .हिंदुओं की हत्या हुई और उसके बाद भी पश्चिम बंगाल ने इतिहास को भुला दिया.
यह इसलिए भी कहना पड़ रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और कांग्रेस के तुष्टीकरण की राजनीति को पाला और पोसा .स्वतंत्रता के बाद लगभग 40 साल तक इन दोनों पक्षों का वर्चस्व रहा. पश्चिम बंगाल की बुद्धिजीवियों के ऊपर सेकुलर का चश्मा लगा रहा. पश्चिम बंगाल के लोग वह काला इतिहास भूल गए जिसमें हजारों की संख्या में हिंदुओं की हत्या की गई थी.हिंदू औरतों ने अत्याचार सहन किया. अपने झूठे सेकुलर agenda को आगे बढ़ाते रहे और आज स्थिति है कि हिंदू फिर से खतरे में है.
ममता सरकार ने भी कम्युनिस्ट का एजेंडा आगे चलाया. पश्चिम बंगाल आज तक एक अलग प्रदेश है ऐसा ही विचार इन नेताओं ने लोगों के मन में भरा . इस चुनाव में पहली बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हिंदुओं ने जमकर एक होकर मतदान किया है. ममता सरकार अब तक यह कहती रही कि यह लड़ाई “मां माटी और मानुष” की है. तो क्या यह विचारधारा भारत मां से अलग है?.
पश्चिम बंगाल के लोगों को यह सोचना चाहिए था की “मां माटी और मानुष” का मतलब क्या है?. ऐसा है तो भी वहां क्यों तुष्टिकरण की राजनीति को उन्होंने आगे बढ़ाया?. कम्युनिस्ट, कांग्रेस और टीएमसी अब तक पश्चिम बंगाल में राज करती रही. पश्चिम बंगाल की आज की स्थिति के लिए जितने पक्ष जिम्मेदार है उतने ही लोग भी. यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि लोग ही पक्ष से ज्यादा जिम्मेदार है. क्योंकि उन्होंने अपने ही इतिहास को भुला दिया.
पश्चिम बंगाल की जनता ने उसे महान सपूतों के कार्यों को भी भुला दिया जिन्होंने हिंदुओं के लिए और हिंदू संस्कृति के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था. बंगाल के उसे संकट काल में कई महान व्यक्तित्व उभरे जिन्होंने बंगाली हिंदुओं के लिए एक सुरक्षित भूमि बनाने का बीड़ा उठाया था. सबसे पहले डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे जो बंगाल के हिंदुओं के रक्षक और सही मायने में पश्चिम बंगाल के निर्माता थे.
पश्चिम बंगाल में अभी जो चुनाव हुए वह यह दर्शाते हैं कि सालों से चलती आ रही दबंगई और तुष्टीकरण को जनता ने नकारा और उन्होंने बढ़-चढ़कर मतदान किया. पश्चिम बंगाल के जो जिले बांग्लादेश से जुड़ते हैं वहां पर इतने सालों में डेमोग्राफी बदल गई है. मुस्लिम आबादी बड़ी और यही जिले ममता के गढ़ माने जाते हैं. जिनके बलबूते पर वह चुनाव में जित हासिल कराती रही है .
यह सच्चाई है कि ममता सरकार मुस्लिम को सपोर्ट करती थी और उनके सपोर्ट से ही जीतती थी. लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि जिस तरह मुस्लिम एक झूठ होकर मतदान करते रहे वैसे हिंदू नहीं करते थे. इस बार पहली बार हमने देखा कि हिंदुओं ने बढ़ चढ़कर एक होकर मतदान किया. पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवी हिंदुओं को इतने साल लग गए?. देर से ही सही लेकिन उनमें जागृति आई, जग गए और उन्होंने एक होकर मतदान किया. चुनाव के नतीजे बताएंगे कि पश्चिम बंगाल क्या चाहता है?. लेकिन जिस तरह से मतदान हुआ है क्या हम यह मान ले की, यह संकेत है कि हिंदू राष्ट्र की तरफ पश्चिम बंगाल आगे बढ़ेगा ?.
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