नई दिल्ली, 6 सितम्बर। भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कम्पनियों की बढ़ती भागीदारी के बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संघटन (ISRO) के कर्मचारियों में हड़कंप मचा हुआ है और नौ कर्मचारी संगठनों ने पहली बार संस्थान के भविष्य को लेकर औपचारिक चिंता जताई है। उन्होंने अंतरिक्ष आयोग के चेयरमैन से लिखित स्पष्टीकरण मांगा है, जो कि डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के सचिव और इसरो के चेयरमैन भी हैं। ये नौ संगठन ISRO केंद्रों के हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसरो को सिर्फ रिसर्च एंड डेवलपमेंट तक सीमित करने की तैयारी तो नहीं
इन कर्मचारी संगठनों ने इसरो चेयरमैन को लिखे पत्र में कहा कि निजी क्षेत्रों की भागीदारी का वे विरोध नहीं करते, कुछ खास कमर्शियल गतिविधियों में प्राइवेट भागीदारी, एक मजबूत और सरकारी मालिकाना हक वाली इसरो के साथ-साथ चल सकती है। लेकिन ऐसी पॉलिसी को बिना बहस के स्वीकार नहीं किया जा सकता, जो इसरो को सिर्फ रिसर्च एंड डेवलपमेंट तक सीमित कर दे जबकि देश के लॉन्च ह्वीकल बनाने और लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने का काम सरकारी हाथों से निकल जाए।
ट्रांसफर की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए
ISRO द्वारा विकसित टेक्नोलॉजी को राष्ट्रीय संपत्ति करार देते हुए संगठनों ने कहा, ‘इसके ट्रांसफर की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए, साथ ही यह रणनीतिक, सुरक्षा और रोजगार से जुड़े पहलुओं के अनुरूप होनी चाहिए। मौजूदा कर्मचारियों का यह अधिकार है कि उन्हें जानकारी दी जाए, उनसे सलाह-मशविरा किया जाए और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। प्राकृतिक न्याय और अच्छे प्रशासन का तकाजा है कि इतनी बड़ी पॉलिसी के बारे में विभाग खुद कर्मचारियों को जानकारी दे।’
इस ज्ञापन पर ISRO स्टाफ एसोसिएशन, SHAR एम्प्लॉइज एसोसिएशन, ISAC एम्प्लॉइज एसोसिएशन, ISRO स्टाफ एसोसिएशन-LPSC, ISRO स्टाफ एसोसिएशन-BBU, NRSA एम्प्लॉइज यूनियन, स्पेस एम्प्लॉइज एसोसिएशन-BBU, ISRO स्टाफ एसोसिएशन-IPRC और SAC एम्प्लॉइज वेलफेयर एसोसिएशन ने हस्ताक्षर किए।
संगठनों ने चेयरमैन के बयान पर उठाए सवाल
IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका के उस बयान का हवाला देते हुए कहा गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘इसरो भविष्य में कोई भी लॉन्च ह्वीकल नहीं बनाएगा। संगठनों ने सवाल उठाया कि ‘क्या यह भारत सरकार, स्पेस कमीशन या DoS का मंजूर किया गया फैसला है।’
पत्र में पूछा गया कि ISRO की भविष्य में तय भूमिका क्या होगी? साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या PSLV, LVM-3, SSLV की डिजाइन, डेवलपमेंट, निर्माण, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और लॉन्च का काम बंद हो जाएगा।
संगठनों ने मांगी जानकारी
संगठनों ने उस संस्थागत व्यवस्था के बारे में भी जानकारी मांगी, जिसके तहत सार्वजनिक रूप से बनाई गई टेक्नोलॉजी, टेस्टिंग सुविधाएं, लॉन्च कॉम्प्लेक्स और जानकारी को प्राइवेट ऑपरेशन में ट्रांसफर किया जा रहा था। उन्होंने कहा, ‘इसरो को सार्वजनिक फंड, सार्वजनिक मकसद और सार्वजनिक वर्कफोर्स के साथ एक राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थान के तौर पर बनाया गया था। लॉन्च-ह्वीकल का डिजाइन, उसे बनाना, इंटीग्रेशन, टेस्टिंग और लॉन्च ऑपरेशन सिर्फ ‘मैन्युफैक्चरिंग कॉन्ट्रैक्ट’ नहीं हैं। ये संगठन की मुख्य क्षमता, संस्थागत जानकारी और रणनीतिक क्षमता हैं।’
नौकरियों को लेकर भी जताई आशंका
कर्मचारी संगठनों ने यह भी आशंका जताई कि यदि इसरो धीरे-धीरे लॉन्च ह्वीकल और सैटेलाइट निर्माण से पीछे हटता है तो मौजूदा कर्मचारियों के सामने काम की कमी की स्थिति पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अतिरिक्त घोषित किया जा सकता है, उन्हें दूसरी जगह भेजा जा सकता है। बिना किसी खास काम के बैठाया जा सकता है जबकि वही कार्य निजी कम्पनियां सरकारी तकनीक का इस्तेमाल करके करेंगी।


