Pitru Paksha 2026: 14 दिन का रहेगा पक्ष, 16 दिनों तक होंगे श्राद्ध कर्म; जानें सभी प्रमुख तिथियां

लखनऊ, 24 सितंबर। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दौरान दिवंगत पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध कर्म से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

वर्ष 2026 में पितृपक्ष की तिथियों को लेकर विशेष स्थिति बन रही है। इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष 14 दिनों का रहेगा, लेकिन श्राद्ध कर्म 16 दिनों तक किए जाएंगे। वहीं, षष्ठी और सप्तमी तिथि एक ही दिन पड़ने के कारण एक तिथि का क्षय होगा।

26 सितंबर से शुरू होंगे श्राद्ध कर्म

हृषिकेश पंचांग के अनुसार, 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा। हालांकि पूर्णिमा श्राद्ध के साथ श्राद्ध कर्म की शुरुआत एक दिन पहले 26 सितंबर से होगी। आश्विन कृष्ण पक्ष में पूर्णिमा तिथि नहीं होने के कारण भाद्रपद पूर्णिमा के दिन दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध किया जाएगा।

इसके बाद 27 सितंबर से महालयारंभ यानी पितृपक्ष के नियमित श्राद्ध शुरू होंगे। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या के साथ होगा। इसे पितृ विसर्जन अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर किसी कारण से नहीं हो पाया हो।

14 दिन के पक्ष में 16 दिन क्यों होंगे श्राद्ध?

इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष भले ही 14 दिनों का रहेगा, लेकिन श्राद्ध कर्म की अवधि 16 दिनों की मानी जाएगी। धार्मिक परंपरा में श्राद्ध के लिए कुतप बेला को महत्वपूर्ण माना गया है और श्राद्ध कर्म की शुरुआत पूर्णिमा से ही मानी जाती है।

इसके अलावा कृष्ण पक्ष के बाद शुक्ल पक्ष में पुत्री के पुत्र यानी दौहित्र द्वारा अपने नाना (मातामह) के श्राद्ध की परंपरा भी बताई गई है। इन्हीं कारणों से इस वर्ष श्राद्ध कर्म की कुल अवधि 16 दिनों की मानी जा रही है।

षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध एक ही दिन

2026 के पितृपक्ष में तिथि क्षय के कारण षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध 2 अक्टूबर को एक ही दिन किया जाएगा। यानी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन संपन्न होगा। अन्य प्रमुख श्राद्ध तिथियों में 29 सितंबर को भरणी श्राद्ध, जबकि 4 अक्टूबर को मातृ नवमी श्राद्ध होगा। 7 अक्टूबर को संन्यासी, यति एवं वैष्णव श्राद्ध के साथ मघा श्राद्ध किया जाएगा। वहीं 9 अक्टूबर को घात चतुर्दशी श्राद्ध और 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या श्राद्ध एवं पितृ विसर्जन होगा।

कौन कर सकता है श्राद्ध?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों का श्राद्ध करना महत्वपूर्ण माना गया है। सामान्य रूप से श्राद्ध का अधिकार पुत्र को बताया गया है। पुत्र के अभाव में पौत्र और उसके अभाव में पुत्री का पुत्र यानी दौहित्र श्राद्ध कर सकता है। धर्मशास्त्रीय परंपराओं में पुत्र के अभाव में विधवा द्वारा पति का श्राद्ध करने का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में सगोत्र व्यक्ति या परिवार के अन्य उत्तराधिकारी द्वारा श्राद्ध कर्म किए जाने की परंपरा भी बताई गई है।

पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व

पितृपक्ष को केवल कर्मकांड का समय ही नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध कर्म से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख, समृद्धि, संतान, यश, बल और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पंचांग और परंपरागत मतों पर आधारित है। अलग-अलग पंचांग और स्थान के अनुसार तिथियों तथा श्राद्ध के समय में अंतर हो सकता है। धार्मिक अनुष्ठान करने से पहले स्थानीय मान्य पंचांग या संबंधित विद्वान से तिथि की पुष्टि कर लेना उचित है।

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