महोबा, 26 अगस्त: देश के अधिकांश हिस्सों में रक्षाबंधन का पर्व सावन पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड की ऐतिहासिक नगरी महोबा में यह परंपरा कुछ अलग है। यहां रक्षाबंधन के साथ कजली विसर्जन भी सावन पूर्णिमा के अगले दिन किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस अनूठी परंपरा का संबंध करीब 844 वर्ष पुराने एक ऐतिहासिक युद्ध से है। महोबा की कजली परंपरा सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। इसे बुंदेलखंड की आन-बान, शौर्य और वीरता से भी जोड़कर देखा जाता है। कजली की लोकगाथाएं आज भी क्षेत्र के लोगों को वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल के पराक्रम की याद दिलाती हैं।
1182 के युद्ध से जुड़ी है परंपरा
जगनिक शोध संस्थान के महासचिव एवं सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र निर्झर के अनुसार, इस घटना का उल्लेख महाकाव्य ‘आल्हा’ में मिलता है। लोकगाथा के मुताबिक, वर्ष 1182 में चंदेल साम्राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की सेना ने हमला किया था। बताया जाता है कि चौहान सेना ने महोबा को घेर लिया था और चंदेल नरेश परमर्दिदेव, जिन्हें परमाल के नाम से भी जाना जाता है, के सामने कई मांगें रखी थीं। इनमें पारस पथरी, नौलखा हार, बेंदुला घोड़ा और राजकुमारी चंद्रावल का डोला सौंपने जैसी मांगों का उल्लेख मिलता है।
रक्षाबंधन के दिन महोबा पर आया संकट
लोकमान्यता के अनुसार, उस समय आल्हा और ऊदल अपने मामा माहिल के षड्यंत्र के चलते महोबा से निष्कासित होकर कन्नौज में रह रहे थे। जब महोबा पर संकट आया तो महारानी मल्हना ने एक सेवक के माध्यम से दोनों वीरों तक इसकी सूचना पहुंचाई। मातृभूमि की पुकार सुनकर आल्हा और ऊदल ने पुराने मतभेद भुला दिए और अपने सहयोगियों के साथ महोबा लौट आए। लोकगाथाओं में वर्णन है कि दोनों ने योगी का वेश धारण कर युद्ध में प्रवेश किया और चौहान सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला। कहा जाता है कि युद्ध इतना भीषण था कि चौहान सेना को पीछे हटना पड़ा। इसी युद्ध के दौरान पृथ्वीराज चौहान के पुत्र करिया के मारे जाने का भी लोकगाथाओं में उल्लेख मिलता है।
युद्ध में बीत गया सावन पूर्णिमा का पूरा दिन
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, महोबा में हुआ युद्ध सावन पूर्णिमा के दिन इतना लंबा चला कि पूरा दिन रणभूमि में ही बीत गया। इस वजह से न तो कजली का विसर्जन हो सका और न ही बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकीं। अगले दिन युद्ध में विजय का उत्सव मनाया गया। इसी दौरान बहनों ने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और कजली का कीरत सागर में विसर्जन किया। मान्यता है कि तभी से महोबा और आसपास के क्षेत्रों में रक्षाबंधन और कजली पर्व अगले दिन मनाने की परंपरा शुरू हुई।
29 अगस्त को मनाया जाएगा रक्षाबंधन
इस वर्ष देश के अधिकांश हिस्सों में रक्षाबंधन 28 अगस्त को मनाया जाएगा। वहीं, महोबा और बुंदेलखंड के कुछ क्षेत्रों में स्थानीय परंपरा के अनुसार 29 अगस्त को रक्षाबंधन मनाया जाएगा। इसी दिन कजली का विसर्जन भी किया जाएगा।वीरभूमि राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. एल.सी. अनुरागी के मुताबिक, महोबा में इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाता है।
सात दिन तक चलता है कजली मेला
कजली पर्व के अवसर पर महोबा में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इसके साथ ही कीरत सागर के तटबंध पर सात दिवसीय कजली मेले का आयोजन होता है। इस मेले में बुंदेलखंड के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा देश के दूसरे हिस्सों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। महोबा की यह अनूठी कजली परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति, वीरगाथाओं और ऐतिहासिक लोकविश्वासों को भी अपने भीतर समेटे हुए है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बनी हुई है।


