मुंबई, 5 सितंबर। हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके किरदारों से नहीं, बल्कि उनके संघर्ष की कहानी से भी बनती है। पंकज त्रिपाठी भी ऐसे ही कलाकार हैं। आज उनका नाम किसी फिल्म या वेब सीरीज से जुड़ता है तो दर्शकों की उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया है। बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर मुंबई की फिल्मी दुनिया तक पहुंचने के सफर में उनके जीवन में खेती-किसानी का माहौल, थिएटर, होटल की नाइट शिफ्ट, आर्थिक तंगी और वर्षों का इंतजार शामिल रहा। कभी दिन में थिएटर करने वाले पंकज रात में होटल की रसोई में काम किया करते थे।
गांव के नाटकों से जागा अभिनय का जुनून
पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितंबर 1976 को बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव में हुआ था। उनके पिता किसान होने के साथ पुजारी भी थे। साधारण ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े पंकज बचपन से ही गांव में होने वाले नाटकों में हिस्सा लेते थे। अभिनय के प्रति उनका आकर्षण उस समय और गहरा हो गया, जब उन्होंने पटना में एक नाटक देखा। नाटक में एक कलाकार के अभिनय ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उनकी आंखों में आंसू आ गए। इसके बाद वह पटना में होने वाले थिएटर देखने के लिए नियमित रूप से जाने लगे।
दिन में थिएटर, रात में होटल की नौकरी
करीब 1996 में उन्होंने थिएटर करना शुरू किया। लेकिन अभिनय के जरिए उस समय घर चलाना आसान नहीं था। ऐसे में उन्होंने नौकरी करने का फैसला किया। पंकज त्रिपाठी ने करीब दो साल तक होटल में नाइट शिफ्ट में काम किया। रात में होटल की रसोई में काम करने के बाद वह कुछ घंटे आराम करते और फिर थिएटर के लिए निकल जाते। दिनभर थिएटर करने के बाद शाम होते ही उन्हें दोबारा अपनी नौकरी पर पहुंचना पड़ता था। यह दिनचर्या आसान नहीं थी, लेकिन अभिनय के प्रति उनका जुनून लगातार बना रहा।
एनएसडी में दाखिले का सपना
पंकज त्रिपाठी के पास महंगे एक्टिंग स्कूल में पढ़ने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। उनका सपना नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिला लेने का था। उन्होंने इसके लिए कई बार परीक्षा दी और आखिरकार 2001 में उनका चयन हो गया।साल 2004 में एनएसडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई पहुंच गए। यहां भी उनके संघर्ष का नया अध्याय शुरू हुआ।
मुंबई पहुंचे तो जेब में थे 46 हजार, फिर बचे सिर्फ 10 रुपये
पंकज त्रिपाठी 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई पहुंचे थे। बताया जाता है कि उस समय उनके पास करीब 46 हजार रुपये थे। लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में काम हासिल करना इतना आसान नहीं था कि यह रकम लंबे समय तक चल पाती। कुछ समय बाद उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई कि उनके पास सिर्फ 10 रुपये बचे थे। उन्होंने छोटे-छोटे किरदारों से शुरुआत की। ‘रन’, ‘अपहरण’, ‘ओमकारा’, ‘शौर्य’, ‘रावण’ और ‘अग्निपथ’ जैसी फिल्मों में नजर आए। टीवी पर भी उन्होंने कई धारावाहिकों में काम किया।
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ ने बदल दी पहचान
साल 2012 में आई ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ पंकज त्रिपाठी के करियर का अहम मोड़ साबित हुई। फिल्म में उनके अभिनय ने दर्शकों के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री का भी ध्यान खींचा। इसके बाद उनके पास फिल्मों की लाइन लगने लगी। ‘फुकरे’, ‘मसान’, ‘निल बट्टे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’, ‘स्त्री’ और ‘लूडो’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाकर अपनी खास पहचान बनाई।
‘मिर्जापुर’ ने घर-घर पहुंचाया नाम
फिल्मों के साथ वेब सीरीज की दुनिया में भी पंकज त्रिपाठी ने अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। ‘मिर्जापुर’ में कालीन भैया का किरदार हो या ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में उनका अभिनय, उन्होंने हर भूमिका को अपने अंदाज में यादगार बना दिया। उनकी खासियत यही रही कि उन्होंने खुद को किसी एक तरह के किरदार तक सीमित नहीं रखा। गंभीर भूमिकाओं से लेकर खतरनाक किरदार और आम आदमी के सहज किरदार तक, उन्होंने हर भूमिका में अपनी अलग छाप छोड़ी।
अभिनय के लिए मिले बड़े सम्मान
पंकज त्रिपाठी को उनके अभिनय के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। फिल्म ‘न्यूटन’ में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं ‘मिमी’ में उनके प्रदर्शन के लिए भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
आज पंकज त्रिपाठी की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने का हौसला रखते हैं। गांव के नाटकों से शुरू हुआ उनका सफर होटल की नाइट शिफ्ट से होता हुआ बॉलीवुड और ओटीटी की दुनिया के बड़े मुकाम तक पहुंचा—और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।


