[अलकेश पटेल] रिवोई न्यूज़, 29 जुलाई, 2026 – हिंदुओं के लिए एक सर्वमान्य आचार संहिता तैयार हो रही है और जल्द ही यह पुस्तक रूप में उपलब्ध होगी, ऐसा काशी विद्वत परिषद के महामंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी जी का कहना है। हाल ही में काशी में रिवोई न्यूज़ के साथ एक विशेष साक्षात्कार में डॉ. रामनारायण द्विवेदी ने आदर्श हिंदू आचार संहिता, राम मंदिर में काशी विद्वत परिषद की भूमिका, काशी की पंचकोशी यात्रा सहित विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की।
उन्होंने बताया कि विभिन्न कारणों से हिंदू समाज में घर कर चुके जाति-पाति के विभाजन के कारण पूरे हिंदू समाज को भारी नुकसान हो रहा है। समाज और देश को इससे बचाने का संकल्प विद्वत परिषद द्वारा लिया गया है। इसी सिलसिले में आचार संहिता तैयार की जा रही है ताकि ऊपरी भेदभाव को दूर करके एक मजबूत देश का पुनः निर्माण किया जा सके।

कौन हैं डॉ. रामनारायण द्विवेदी?
डॉ. रामनारायण द्विवेदी जी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। देश और दुनिया के विभिन्न हिंदू संगठनों से सक्रिय रूप से जुड़े डॉ. द्विवेदी वर्तमान में काशी विद्वत परिषद के महामंत्री के रूप में देश में हिंदू समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर सक्रिय भूमिका निभाकर मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने रिवोई को बताया कि एक हजार साल बाद वर्तमान समय भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। यही वह समय है जब हमारे पास सभी क्षेत्रों में सर्वोच्च स्थान पर पहुँचने का अवसर निर्मित हुआ है।
डॉ. द्विवेदी जी के अनुसार देश की मानव संपदा तो वही है, लेकिन पहले राजनीतिक और शासकीय सहित विभिन्न प्रकार की प्रतिकूलताओं के कारण हम विश्वगुरु बनने का सपना नहीं देख पाते थे। हालाँकि, आज ये सभी अनुकूलताएँ बनने से हम जल्द ही विश्वगुरु बनेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है, ऐसा विश्वास उन्होंने व्यक्त किया।
काशी की पंचकोशी परिक्रमा: आध्यात्मिक महात्म्य, दार्शनिक रहस्य और मोक्ष का धाम
इस विशेष साक्षात्कार के दौरान द्विवेदी जी ने काशी की विश्व प्रसिद्ध पंचकोशी परिक्रमा के बारे में भी कुछ बहुत सुंदर बातें बताईं। उन्होंने कहा कि साहित्य और शास्त्र में आता है कि ‘वाक्यार्थ ज्ञान’ से पहले ‘पदार्थ ज्ञान’ होना आवश्यक है। अद्वैत दर्शन और वेदांत में शरीर और चेतना से जुड़े 5 कोश (अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश) की चर्चा आती है। शास्त्रों में इन 5 कोश और 5 देवों की उपासना (पंचदेवोपासना) का महिमा सनातन परंपरा में सर्वत्र प्रसिद्ध है।
इसके साथ ही, काशी भगवान शिव की नगरी है और शिव का स्वरूप ‘पंचवक्त्र’ (पाँच मुख वाला) माना गया है। पंचमी तिथि को भी शास्त्रों में पूर्ण तिथि माना गया है, इस दिन आराधना-उपासना करने से ईशानेश्वर महादेव के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। ‘ईशानः सर्वविद्यानाम्’ के अनुसार ईशानेश्वर महादेव समस्त विद्याओं के दाता हैं।

‘पंचकोशी’ नाम का रहस्य और दूरी
इन सभी ‘पंच’ शब्दों के समन्वय से इस यात्रा का नाम पंचकोशी पड़ा। व्यावहारिक दृष्टि से यदि संपूर्ण पंचकोशी परिक्रमा के मार्ग को जोड़ा जाए, तो वह लगभग 25 कोश (Pancha Vin Sati Kosi) के आसपास होता है। लोकबोली में या संक्षेप में उच्चारण करने के कारण 25 कोश की इस परिक्रमा को संक्षेप में ‘पंचकोशी’ के रूप में जाना जाता है।
पापमुक्ति और पंचकोशी की विशिष्टता
काशी में भगवान शिव का स्वरूप हर युग में बदलता है। सत्ययुग (कृतयुग) में छत्र आकार, त्रेता में चक्र आकार, द्वापर में रथ आकार और कलियुग में काशी शंखाकार रूप में विराजमान है।
शास्त्रों में पंचकोशी क्षेत्र की महिमा बताते हुए कहा गया है:
अन्यक्षेत्रे कृतं पापं पुण्यक्षेत्रे विनश्यति |
पंचकोश्यां कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति ||
अर्थात्, अन्य स्थानों पर किए गए पाप पुण्यक्षेत्र में जाने से नष्ट हो जाते हैं, लेकिन काशी और पंचकोशी क्षेत्र के भीतर किया गया पाप वज्रलेप (अक्षय) बन जाता है। इसीलिए काशीवासियों के लिए वर्ष में एक बार पंचकोशी परिक्रमा करने का विधान है। जाने-अनजाने में हुए पापों का निवारण इस पंचकोशी परिक्रमा से हो जाता है।
मणिकर्णिका घाट का महात्म्य
काशी का मणिकर्णिका घाट श्रेष्ठ तीर्थ है। जब भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर नृत्य कर रहे थे, तब माता पार्वती की मणिका (कान के पास की मणिका/कुंडल) इस स्थान पर गिर गई थी, इसलिए इस स्थान का नाम ‘मणिकर्णिका’ पड़ा। स्कंद पुराण के ‘काशीखंड’ में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
ऐसा माना जाता है कि प्रतिदिन मध्याह्न काल में स्वयं भगवान शिव, समय-समय पर समाधि जी, भैरव जी, दत्तात्रेय जी तथा महर्षि वेदव्यास जी यहाँ स्नान करने पधारते हैं। संतों की परंपरा के अनुसार, पूज्य भारती तेज महाराज जैसे सिद्ध संतों ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि यदि कोई दोपहर 12:00 बजे के बाद गंगा किनारे काले तिल और चावल लेकर बैठे और कोई पूर्ण सिद्ध पुरुष वहाँ स्नान करते हुए दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि वे स्वयं वेदव्यास जी या सिद्ध संत हैं। इसीलिए भूमंडल पर मणिकर्णिका के समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है।
परिक्रमा की पद्धति और विधान
बनारस के समाज में गुरु के रूप में प्रचलित डॉ. द्विवेदी जी ने परिक्रमा की पद्धति और इसके विधान के बारे में भी रिवोई को विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पंचकोशी परिक्रमा की शुरुआत मणिकर्णिका घाट पर स्नान करके, संकल्प लेकर होती है। तत्पश्चात बाबा विश्वनाथ के ज्ञानवापी तीर्थ पर संकल्प होकर यात्रा आगे बढ़ती है। मार्ग में कंदवा (पांडव स्थान), भीमचंडी, रामेश्वर जैसे विभिन्न पावन पड़ाव आते हैं।
૧. महाशिवरात्रि की परिक्रमा (धावती यात्रा): महाशिवरात्रि के समय काशीवासी एक ही दिन में यह परिक्रमा पूरी करते हैं। इसे ‘धावती’ (दौड़ती) यात्रा कहते हैं, जिसमें बिना रुके, निरंतर चलते रहकर यात्रा पूर्ण की जाती है।
૨. ऋतु के अनुसार परिक्रमा: अगहन (मार्गशीर्ष) या माघ महीने में शास्त्रोक्त विधि-विधान से यात्रा करने का महात्म्य है।
सांख्य दर्शन और 25 तत्वों का विज्ञान
सांख्य दर्शन के अनुसार हमारा शरीर 25 तत्वों (Panchavin Sati Tattva) – पंचमहाभूत, पंचतन्मात्रा, पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय और मन-बुद्धि-अहंकार-चित्त आदि से बना है।
जब साधक 25 कोश की पंचकोशी परिक्रमा करता है, तब उसके शरीर का एक-एक तत्व जाग्रत होता है और संपूर्ण शरीर दीपक की ज्योति के समान प्रकाशित हो उठता है। हमारी 10 इंद्रियों (आँख, कान, हाथ आदि) द्वारा हुए पापों का प्रायश्चित्त इस यात्रा द्वारा होता है।
यदि कोई साधक बिना पादुका (जूते) के, मौन रहकर, एक समय भोजन करके या निराहार रहकर शास्त्रोक्त नियमों और व्रतों के साथ यह परिक्रमा करे, तो उसे शास्त्रों में वर्णित संपूर्ण फल प्राप्त होता है।
काशी का व्यापक स्वरूप और दार्शनिक संतों की भूमि
काशी में केवल पंचकोशी ही नहीं, बल्कि अंतर्ग्रही परिक्रमा, अष्ट भैरव यात्रा, अष्ट विनायक यात्रा, 56 विनायक यात्रा और केदारखंड यात्रा जैसी विभिन्न परिक्रमाओं का महात्म्य है। केदारखंड में जब कोई जीव देह त्याग करता है, तब उसके पाप चाहे कितने भी गंभीर हों, शिवजी उन्हें शीघ्र भस्म करके ‘ढूंढि यात्रा’ और ‘रुंडिराज’ की कृपा से मुक्ति प्रदान करते हैं।
काशी समरसता का उत्तम प्रतीक है। यहाँ माता अन्नपूर्णा के चरणों में भगवान शिव स्वयं भिक्षा माँगते हैं। काशीवासियों के लिए संपूर्ण त्रिलोक ही अपना देश है:
स्वदेशो भुवनत्रयम् |
सर्वे भवन्तु सुखिनः ||
यह भूमि भगवान शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन, रामानुजाचार्य के विशिष्टद्वैत दर्शन तथा संत कबीर, संत रविदास (रैदास), गोस्वामी तुलसीदास और रामानंदाचार्य जैसे महान संतों की साधनाभूमि रही है।
निष्कर्ष:
काशी केवल एक शहर नहीं है, बल्कि मोक्ष का महाविश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वयं बाबा विश्वनाथ हैं और अन्नदात्री माता अन्नपूर्णा हैं। पंचकोशी परिक्रमा जीवात्मा को उसके सभी पापों से मुक्त करके परम पद (मोक्ष) की ओर ले जाने वाला दिव्य मार्ग है।


