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लाल आतंक का अंत

लाल आतंक का अंत

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By Varsha Pargat

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद के खिलाफ कैसे सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए दशकों से चले आ रहे आतंक का अंत कर दिया और भारत नक्सलवादी हिंसा से मुक्ति की ओर बढ़ रहा है इसके बारे में संसद और पूरे देश को बताया.

भारत कई दशकों तक इस समस्या से लड़ रहा था. लाल आतंक ने भारत के बीचो-बीच अपना केंद्र बनाया और इसके तार नेपाल से लेकर आंतरिक आंध्र प्रदेश तक फैल गए.

वामपंथी विचारधारा ने देश के 12 राज्यों में नक्सलवाद फैलाया 1947 से 1970 तक आदिवासियों को उनके पारंपरिक आराध्यों से हटाकर “माओवादी विचारधारा” की ओर मोड़ा गया. इस विचारधारा से नक्सलवाद कई वर्षों तक पनपता रहा.

स्वाधीनता के बाद वामपंथियों ने जिस तरह से शिक्षा व्यवस्था को अपने कब्जे में किया उसी तरह उन्होंने अपने विचारों को फैलाने के लिए भोले भाले आदिवासियों को अपना राजनीतिक मोहरा बनाया.

वामपंथियों ने शिक्षा व्यवस्था अपने हाथों में ली जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने उनके सहयोग से चुनाव जीता. शिक्षा व्यवस्था में अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए वामपंथियों ने अपने विचारों और आईडियोलॉजी को विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले भोले भाले छात्रों के मन में प्रतिस्थापित किया. उन्होंने अपने विचारों को मजबूत करने के लिये इतिहास को तोड़ मरोड़ कर लिखा और एक विशेष नैरेटिव के साथ बच्चों को पढ़ाया गया. इस विशेष नैरेटिव को विश्वविद्यालयों के सिलैबस में स्थापित किया. जिसका परिणाम हमारे युवाओं के अवचेतन मन में गहरी पैठ कर गया. दिल्ली की एक मशहूर यूनिवर्सिटी को तो इनका गढ़ माना जाता है.

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कई पीढ़ियां इन विचारों को ही सच मानकर तैयार हुई और भारत के लोकतंत्र एवं संसदीय व्यवस्था को ही अपना दुश्मन मानते हुए बढ़ी हुई। साथ ही यदि सरकार नक्सलवादियों की नाजायज मांगो को नहीं मानती है तो सशस्त्र क्रांति ही एकमात्र विकल्प है इस तरह के विष का बीजारोपण छात्रों के कोमल हृदय में प्रतिस्थापित किया गया। इस ख़ास विचारधारा के बुद्धिजीवियों को आज हम “अर्बन नक्सल” कहते है।

इसमें कुछ लेखक, कलाकार, अध्यापक, समाज सेवक भी  शामिल थे. जब शहरी विभागों में ऐसे “अर्बन नक्सल” काम कर रहे थे तो दूसरी ओर आदिवासियों को भी भ्रमित करके उनके हाथों में बंदूक थमा दी गई। ऐसे आदिवासी अपने ही देशवासियों को अपना दुश्मन मानने लगे. आदिवासियों को षड्यंत्र के तहत इन वामपंथियों ने विकास से दूर रखा. इन वामपंथियों ने आदिवासियों को अपने देश और शासन के खिलाफ भड़काया और इन आदिवासियों को मुख्य धारा में आने से रोके रखा और फिर दूसरी ओर यह भी बात उनके मन में भर दी जाती थी कि देश, सरकार आपके लिए कुछ नहीं करती है. आपको अपने हक की लढ़ाई लड़नी  है तो हथियार उठाने होंगे.

नक्सलवादी अवैध शासन चलाते थे. जंगलों के बीच फर्जी अदालत लगाकर अनगिनत लोगों को मौत के घाट उतार दिया।  लोगों में नक्सलियों का भय इतना था कि कोई उनके खिलाफ आवाज उठाने का साहस नहीं कर पता था. इस नक्सलवाद ने लाखों आदिवासियों को अज्ञान के अंधेरे में रखा. ये लोग विकास से वंचित रह गए. और उनके विकास की बातें सिर्फ आंदोलन में सीमित रह गई.

भारत के मध्य में दूसरी वैध सरकार चलने लगी। भारत के बाहर और अंदर के दुश्मनों ने उन्हें हथियार देने शुरू किये। घने जंगलों में छिपकर हमारी पुलिस एवं सुरक्षा जवानों के ऊपर आक्रमण करने लगे।  इस तरह हजारों पुलिस एवं सुरक्षा जवान इनके हमले में वीरगति को प्राप्त हुए। हजारों निर्दोष नागरिकों की हत्याऐं  हुई। सरकार ने इसे रोकने के लिए स्पेशल टॉस्क फोर्स की स्थापना की।

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घने जंगलों में इन लोगों को ढूंढना और पकड़ना एक बहुत बड़ा चैलेंज था। इसके बावजूद सरकार अपने प्रयास करती रही बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया लेकिन इसका कोई असर नहीं हो रहा था। 2014 के बाद नक्सलवाद की घेराबंदी शुरू हो गई, फर्जी एनजीओ के द्वारा जो बाहर से आ रही फंडिंग रोका गया। कई फर्जी एनजीओ को बंद कर दिया गया। अर्बन नक्सलवाद को रोकने के लिए कई प्रयास किए गए। और फिर धीरे धीरे उनके किले दरारें पड़ने लगी।

सरकार ने धमकियों के आगे झुकना बंद किया। हथियार डालने वालों से बातचीत होने लगी। उनके पुनर्स्थापना के लिए कई सारी योजनाएं शुरू की गई। प्राथमिक सुविधा उपलब्ध कराने का काम भी शुरू हुआ। जो नक्सलवादी शरण आना चाहते थे उनका स्वागत सरकार ने किया। उनको समाज में स्थापित करने की जिम्मेदारी उठाई। लेकिन जो नक्सलवादी हथियार डालना नहीं चाहते थे उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू रही। गोलियों का जवाब गोलियों से दिया जाने लगा। कई नक्सली मारे गए, कई पकड़े गए उनके सरगना शरण आए या मारे गए। धीरे-धीरे आदिवासी विभागों में जागृति निर्माण होती गई और आज भारत नक्सलवाद से मुक्ति की ओर बढ़ चला है ऐसी घोषणा संसद में गृह मंत्री श्री अमित शाह ने ३० मार्च २०२६ को कर दी।

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