सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाई कोर्ट का विवादास्पद फैसला, कहा- पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास
नई दिल्ली, 18 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादास्पद फैसला रद करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा कि ‘किसी महिला को गलत तरीके से छूना और उसके पायजामे का नाड़ा खोलना रेप का प्रयास माना जाएगा।’ हाई कोर्ट के फैसले में इस अपराध को रेप का प्रयास नहीं बल्कि रेप की तैयारी बताया गया था। शीर्ष अदालत ने इसी क्रम में न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता लाने के लिए समिति को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश भी जारी किए हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला 17 मार्च, 2025 को आया था। अदालत के इस फैसले पर काफी हंगामा मचा, NGO ‘We the Women’ की संस्थापक अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता के एक लेटर के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले पर संज्ञान लिया। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने मंगलवार को हाई कोर्ट के फैसले को रद कर दिया है। बेंच ने इसी क्रम में पॉक्सो एक्ट के तहत दो आरोपितों पर रेप की कोशिश का सख्त आरोप फिर से लगा दिया।
शीर्ष अदालत की टिप्पणी
NGO की अध्यक्ष शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फुल्का ने बेंच के समक्ष यौन अपराधों के मामले में महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता दिखाने की अपील की थी। इस पर बेंच ने कहा, ‘किसी भी जज या अदालत से पूर्ण न्याय कि उम्मीद तब तक नहीं की जा सकती, जब तक वह किसी वादी की वास्तविकताओं और अदालत में आते समय उनको किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, उनके प्रति असंवेदनशील हो।’
जजों को दया और सहानुभूति का माहौल बनाना चाहिए : CJI
CJI सूर्यकांत ने अपने फैसले में लिखा कि जजों को सिर्फ संवैधानिक और कानूनी सिद्धांतों को सही ढंग से लागू करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि दया और सहानुभूति का माहौल भी बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन दोनों चीजों के बिना, न्यायिक संस्थाएं अपने काम ठीक से नहीं कर पाएंगी। बेंच ने यह भी कहा, ‘कानूनी प्रक्रिया में हमारे फैसलों में, चाहे वह आम नागरिकों के लिए प्रक्रिया तय करना हो या किसी मामले में अंतिम फैसला देना हो, दया, मानवता और समझदारी दिखनी चाहिए। ये एक निष्पक्ष और प्रभावी न्याय व्यवस्था बनाने के लिए बहुत जरूरी है।
नए दिशा-निर्देश नहीं जारी करेगा सुप्रीम कोर्ट
सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जजों को संवेदनशील बनाने के लिए सिद्धांत तय किए गए हैं, इसलिए वह नए सिरे से कोई दिशा-निर्देश बनाने के बजाय मौजूदा सिद्धांतों पर ही आगे बढ़ेगा।
जजों में कैसे लाई जाए संवेदनशीलता, SC ने मांगी रिपोर्ट
शीर्ष कोर्ट ने इसी क्रम में नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी के निदेशक जस्टिस अनिरुद्ध बोस से एक विशेषज्ञों की समिति बनाने का अनुरोध किया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में जजों और न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता और दया कैसे लाई जाए, इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी।
बेंच ने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि ये दिशा-निर्देश भारी-भरकम और विदेशी भाषाओं से लिए गए कठिन शब्दों से भरे नहीं होंगे।’ इसी पीठ ने पहले तत्कालीन सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की ‘Handbook on Combating gender Stereotypes’ को भी हार्वर्ड-ओरिएंटेड यानि बहुत ज्यादा अकादमिक और विदेशी शैली का बताया था।
