मुंबई, 27 सितंबर। अभिनेत्री कुब्रा सैत ने महिलाओं की सुरक्षा और समाज की सोच को लेकर एक वीडियो साझा किया है। इस वीडियो में उन्होंने उस रवैये पर सवाल उठाया, जिसमें महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए लगातार सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। कुब्रा ने सवाल किया कि लड़कियों को सुरक्षित रहने के तरीके सिखाने के बजाय लड़कों को दूसरों को असुरक्षित न बनाने की सीख क्यों नहीं दी जाती?
वीडियो की शुरुआत कुब्रा सैत इस टिप्पणी से करती हैं कि सुरक्षा एक ऐसी जगह है, जिसका नाम नार्निया है और वह काल्पनिक है। इसके बाद वह महिलाओं और बच्चियों के साथ होने वाली हिंसा तथा उत्पीड़न की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहती हैं कि उम्र, जगह, समय या परिस्थिति महिलाओं की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देती।
महिलाओं को दी जाने वाली सलाह पर सवाल
कुब्रा ने वीडियो में उन तमाम सलाहों पर सवाल उठाया, जो लड़कियों और महिलाओं को बचपन से दी जाती हैं। इनमें सही कपड़े पहनने, रात में बाहर न जाने, लड़कों से दूरी बनाए रखने, अपनी लोकेशन शेयर करने और पेपर स्प्रे रखने जैसी बातें शामिल हैं। उन्होंने सवाल किया कि महिलाओं को आखिर और कितना सावधान रहने के लिए कहा जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि ऐसी हिदायतें लड़कों तक कब पहुंचेंगी?
‘ना’ का मतलब ‘ना’ समझने की सीख
कुब्रा ने अपने संदेश में लड़कों को किसी का पीछा नहीं करने, डराने या धमकाने से बचने और किसी के इंकार का सम्मान करने की बात कही। उन्होंने सहमति यानी कंसेंट की समझ को जरूरी बताते हुए कहा कि ‘ना’ को ‘ना’ ही समझना चाहिए। अपने व्यंग्यात्मक अंदाज में उन्होंने ‘रिफॉर्मेशन कैंप’, ‘कंसेंट कैंप’, ‘ईगो डिटॉक्स’ और ‘पितृसत्ता मुक्ति केंद्र’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उस सोच पर टिप्पणी की, जिसमें गलत व्यवहार को सामान्य मान लिया जाता है।
‘लड़के तो लड़के ही रहेंगे’ वाली सोच पर निशाना
कुब्रा ने कहा कि ‘लड़के तो लड़के ही रहेंगे’ वाली परवरिश काम नहीं कर रही है। उनके वीडियो का संदेश यह है कि महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल महिलाओं की सावधानियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज को पुरुषों के व्यवहार और सहमति के प्रति उनकी समझ पर भी बात करनी चाहिए।
उन्होंने नारीवाद को महिलाओं के समान मानवीय अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि महिलाओं को पढ़ने, हंसने, प्यार करने, बाइक चलाने, सार्वजनिक जगहों पर रहने और अपनी पसंद के मुताबिक जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए, बिना इस डर के कि उन्हें इसके लिए दोषी ठहराया जाएगा।
कुब्रा का वीडियो महिलाओं से और अधिक पाबंदियां या सावधानियां बरतने के बजाय समाज की जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा करता है। उनका संदेश इस बात पर केंद्रित है कि महिलाओं की आजादी सीमित करने के बजाय उन व्यवहारों और सोच में बदलाव की जरूरत है, जो उन्हें असुरक्षित महसूस कराते हैं।


