CJP के विरोध प्रदर्शन के खिलाफ काररवाई पर UN में उठे सवाल, भारतीय अधिकारी ने दिया करारा जवाब

नई दिल्ली, 21 अक्टूबर। SIR प्रकरण में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के खिलाफ दिल्ली पुलिस की काररवाई को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) में सवाल उठाने पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। यूएन में भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव डालने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के 20 से अधिक मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दिल्ली पुलिस की काररवाई पर चिंता जताई थी। भारत ने आरोपों और अधूरे आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नकारात्मक छवि पेश करने की कोशिशों का विरोध किया है।

विदेश मंत्रालय में उप सचिव बरखा ताम्रकार ने कहा, ‘भारत अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तंत्रों के साथ जुड़ता है, लेकिन यह जुड़ाव बातचीत, परामर्श, सहयोग, निष्पक्षता और पारदर्शिता जैसे सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।’

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में वर्किंग ग्रुप ऑन एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस से जुड़े एजेंडे पर मंगलवार को भारत की ओर से ताम्रकार ने अपना बयान दिया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानवाधिकारों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने या चुनिंदा देशों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। ताम्रकार ने कहा, ‘हम अन्य प्रतिनिधिमंडलों से अपील करते हैं कि वे रिपोर्ट का सही संदर्भ में हवाला दें, न कि किसी मानवीय मुद्दे से जुड़ी जानकारी को एक अंतिम फैसले या निष्कर्ष के रूप में पेश करें।’

उन्होंने कहा कि भारत तय प्रक्रियाओं के जरिए विशिष्ट और उचित रूप से प्रलेखित मामलों पर स्पष्टीकरण देने के लिए तैयार है। लेकिन, भारत उन कोशिशों का कड़ा विरोध करता है, जिनमें बिना पुष्टि वाले आरोपों, अधूरे आंकड़ों या ऐसी रिपोर्टों का इस्तेमाल करके दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की निगेटीव इमेज बनाने की कोशिश की जाती है। इनमें भारत के बारे में कोई ठोस अवलोकन (ऑब्जर्वेशन) भी शामिल नहीं होता है.

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र के 20 से अधिक मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मंगलवार को दिल्ली में युवाओं के नेतृत्व वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के खिलाफ पुलिस की बार-बार की गई कठोर काररवाई पर चिंता जताई। विशेषज्ञों ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में, देश के अलग-अलग हिस्सों में हजारों छात्र और उनके समर्थक शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ये प्रदर्शन शिक्षा प्रणाली से जुड़े सरकारी फैसलों और हाल ही में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ किए जा रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों से मांग की कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में न्याय सुनिश्चित किया जाए।

पिछले हफ्ते भी, भारत ने संयुक्त राष्ट्र के एक मानवाधिकार विशेषज्ञ की रिपोर्ट को ‘सुनी-सुनाई बातें’ बताकर खारिज कर दिया था। इस रिपोर्ट में देश के युवाओं द्वारा शुरू किए गए एक ‘व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन’ का जिक्र था और आरोप लगाया गया था कि उन्हें बदले की काररवाई का सामना करना पड़ा। नई दिल्ली ने विशेषज्ञ से आग्रह किया था कि बिना पुष्टि किए गए आरोपों के आधार पर मुद्दों को गलत तरीके से पेश करने से पहले, वे इन दावों की ‘सच्चाई की जांच’ कर लें।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान ‘प्रदर्शनकारियों, प्रदर्शन के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिए जाने की खबरों’ पर भी चिंता जताई थी। भारत ने इन विरोध प्रदर्शनों पर मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की टिप्पणियों को ‘अनुचित’ और देश के आंतरिक मामलों में ‘अस्वीकार्य हस्तक्षेप’ करार दिया।

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