By Varsha Pargat
असम, केरल में और पुडुचेरी में मतदान हो गया. तीनों ही राज्यों में लोगों ने जमकर मतदान किया वहां के लोगों ने अपना ही एक रिकॉर्ड बनाया है. मतदान प्रतिशत भी बड़ा है और यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत है. असम में अनुमान के अनुसार भाजपा वापस आते दिख रही है. केरल और पुडुचेरी में संदेह है. इन राज्यों के चुनाव में से हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण चुनाव असम के थे और अब पश्चिम बंगाल के चुनाव भी हमारे लिए महत्वपूर्ण है.
असम और पश्चिम बंगाल यह दोनों प्रदेश बांग्लादेश के साथ अपने बॉर्डर्स शेयर करते हैं. असम में बीजेपी की सरकार आने से पहले किस तरह से वहां कांग्रेस सरकार ने रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुसलमानों को बसाने का काम किया यह हम सब जानते हैं. जब से बीजेपी की सरकार आई और हिमंता बिस्वा शर्मा मुख्यमंत्री बने हैं असम में घुसपैठियों को रोका जा रहा है और एक बदलाव को हमने देखा है असम में मुस्लिम जनसंख्या अधिक है लेकिन वहां के लोग जो बांग्लादेश उनके खिलाफ खड़े हुए वह उल्लेखनीय है. असम को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है क्योंकि असम में से ही पूर्वोत्तर राज्यों के लिए दरवाजे खुलते हैं इसलिए वहां राष्ट्रवादी सरकार आना बहुत जरूरी था और आज भी है.
असम की जनता ने जिस तरह सामने आकर खुलकर मतदान किया, यह जताता है कि वहां के लोगों ने यह चुनाव अपने अस्तित्व के लिए लड़ा और उसे समझ कर चुनाव में हिस्सा लिया.
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पश्चिम बंगाल की बात करें तो बंगाल के बारे में हम सभी लोग मानते हैं कि वहां सरकार बदलना कितना जरूरी है. सभी राष्ट्रवादी लोग इसके बारे में सोच रहे हैं और अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि पूरा भारत “बंगाल” का चुनाव लड़ रहा है.
पश्चिम बंगाल जहां से राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी विचारों का उद्गम हुआ वहां आज हिंदुओं की सुरक्षा पर बहुत सवाल खड़ा है. बंकिम चंद्र चटर्जी से लेकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक ऐसे कई राष्ट्रवादी नेताओं ने भारत को दिशा दी और इतिहास में अपना नाम अमर किया.
इसके साथ-साथ बंगाल ने इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी देखी है. विभाजन के भयानक और अमानवीय अत्याचार का साक्षी है पश्चिम बंगाल. डायरेक्ट एक्शन डे का भी साक्षी है बंगाल. कला, संस्कृति, देशप्रेम और बुद्धिजीवियों का बंगाल। परंतु बंगाल का दूसरा एक ह्रदय विदारक सत्य यह भी हैं की स्वतंत्रता के बाद वामपंथियों और कांग्रेस ने किस तरह से बंगाल पर राज किया.
लगभग 30-35 साल वामपंथियों की सरकार पश्चिम बंगाल में थी और इन वामपंथियों ने चीन का एजेंडा अच्छे से चलाया. लगभग तीन-चार पीढ़ियों की मानसिकता इन्होंने बदलकर रख दी. आज़ादी के पश्चात काँग्रेस के कार्यकाल में क्या होता रहा यह भी हमें अच्छे से ज्ञात है और पिछले 15 साल ममता की सरकार ने बंगाल को कहां लाकर खड़ा दिया खड़ा कर दिया, यह हम देख रहे हैं.
बंगाल में विकास की बात नहीं हो रही है और बंगाल में कोई अपना इन्वेस्टमेंट भी नहीं करना चाहता. टाटा नैनो के साथ क्या हुआ यह हम सब जानते हैं. ममता ने वामपंथी और कांग्रेस को पीछे रखते हुए बंगाल एक अलग प्रदेश है जताने का भरपूर प्रयास किया. बंगाल के लोग ‘राष्ट्रवाद’ की विचारधारा से कटते चले गए।
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बंगाल के लोग बुद्धिजीवी माने जाते हैं जिन्हें भद्र लोग भी कहा जाता है इन्होंने भी राष्ट्रवादी विचारों को पनपने नहीं दिया. इसलिए इतने सालों तक वामपंथी, कांग्रेस और ममता की सरकार बनती रही।
पश्चिम बंगाल भी बांग्लादेश के साथ अपनी बॉर्डर शेयर करता है और इसीलिए बंगाल और असम ये दोनों राज्य हमारे लिए सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. इसीलिए भाजपा अपना पूरा जोर बंगाल में लग रही है.
बंगाल में ममता और टीएमसी ने इसके पहले हुए चुनावों में हिंसा का कैसा तांडव मचाया था ये याद करके आज भी हिन्दू सहर उठता है. और इसी को ध्यान में रखते हुए सीआरपीएफ की बख्तरबंद गाड़ियों का काफिला बंगाल पहुंच चुका है. चुनाव आयोग ने 2400 से अधिक कंपनियां अर्थात ढाई लाख से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किये है. जो अब तक का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच माना जा रहा है. कोलकाता के भवानीपुर सहित विभिन्न संवेदनशील इलाकों में सीआरपीएफ की टुकड़ियां सामान्य जनता को आश्वस्थ करने हेतु मार्च निकाल रही है. ताकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो सके.
इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, भारत और बंगाल का सुरक्षित भविष्य तय करेंगे बंगाल के मतदाता। फिर भी बंगाल की जनता नहीं जागती है तो आगे आने वाले कठिन दिनों के लिये वे स्वयं जिम्मेदार होंगे।
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