Vijayadashami: कानपुर में दशहरे पर रावण की पूजा! साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं दशानन मंदिर के कपाट

कानपुर, 10 अक्टूबर। देशभर में विजयादशमी के दिन जहां रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां दशहरे पर रावण की पूजा-अर्चना होती है। शिवाला क्षेत्र स्थित कैलाश मंदिर परिसर में बना दशानन मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार, विजयादशमी के दिन खोले जाते हैं। दिनभर दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद शाम को मंदिर के कपाट फिर अगले साल तक के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

1868 में हुआ था मंदिर का निर्माण

मंदिर के पुजारी पंडित राम बाजपेयी ने बताया कि दशानन मंदिर का निर्माण वर्ष 1868 में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने कराया था। विजयादशमी की सुबह मंदिर के कपाट खुलने के बाद रावण की प्रतिमा का दूध और पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना और आरती होती है। दशहरे के दिन मंदिर में दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त रावण की प्रतिमा पर फूल चढ़ाते हैं और तेल के दीपक जलाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। कई श्रद्धालु यहां बल, बुद्धि और विवेक की कामना लेकर आते हैं।

रावण को विद्वान और शिवभक्त के रूप में पूजते हैं श्रद्धालु

दशानन मंदिर की सबसे खास बात यहां रावण को लेकर प्रचलित मान्यता है। मंदिर में रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान, बुद्धिमान और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी देखा जाता है। इसी मान्यता के चलते विजयादशमी के दिन श्रद्धालु रावण की प्रतिमा की पूजा करते हैं और उससे जुड़े विद्वान तथा शिवभक्त स्वरूप के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।

रावण नहीं, उसके अहंकार का होता है अंत

मंदिर के पुजारी राम बाजपेयी के मुताबिक, दशहरे पर रावण के पुतले का दहन करने की परंपरा का संदेश उसके अहंकार के अंत से जुड़ा है। उनका कहना है कि यदि रावण में अहंकार नहीं होता, तो उसका पतन नहीं होता। मंदिर में रावण की पूजा उसके विद्वान और शिवभक्त स्वरूप के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए की जाती है। पुजारी ने बताया कि मंदिर की पूजा-परंपरा उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है और परिवार की तीसरी पीढ़ी इस परंपरा को निभा रही है। मंदिर में रावण का जन्मदिन भी मनाया जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु दीपक जलाकर अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं।

साल में एक दिन होते हैं दर्शन

विजयादशमी की सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। पूरे दिन पूजा-अर्चना और दर्शन होते हैं। शाम को रावण के पुतले के दहन के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, जो अगले साल दशहरे पर ही खुलते हैं। कानपुर का यह दशानन मंदिर विजयादशमी की परंपरा के बीच एक अलग धार्मिक मान्यता को सामने लाता है, जहां रावण के विद्वान और शिवभक्त स्वरूप को याद करते हुए श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular