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स्त्री बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है

स्त्री बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है

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— वर्षा परगट

International Women’s Day आज पूरा विश्व अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है. इसकी शुरुआत 1975 से हुई जब यूनाइटेड नेशन से यह घोषित किया कि 8 मार्च “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” के रूप में मनाया जाएगा. यह दिवस महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक,  सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों को संपूर्ण विश्व के समक्ष स्त्री शक्ति के सामर्थ्य एवं उनके गुणगान हेतु प्रस्तुत किया जाता हैं. इसके साथ ही लैंगिक समानता के लिए समाज में हुए संघर्ष और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने का एक वैश्विक दिवस है.

उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में श्रम आंदोलनों से उभरकर यह आंदोलन तेज होता गया. प्रथमतः यह आंदोलन महिलाओं के लिए मताधिकार एवं कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए बेहतर सुविधाओं/ परिस्थितियों के लिए था. आज इसका स्वरूप व्यापक हो गया है, आज यह दिवस समाज में जनजागृति और महिला सशक्तिकरण का आव्हान करता है.

21वीं सदी में जब हम आधुनिकता एवं विकास की अनुभूति करते हुए यह भी महसूस करते हैं कि समाज में अभी भी महिलाओं का शोषण और उत्पीड़न किया जाता है. घर से लेकर ऑफिस तक कई बार महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठते रहे हैं.

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भारत के दृष्टिकोण से इसका बंधन होना आवश्यक है. भारत की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति और सभ्यता के केंद्र में महिला ही थी. हमारे पौराणिक ग्रंथ हो या फिर वेद, उपनिषद सभी में “महिला” या “स्त्री” को सृजन और संवर्धन का केंद्र मानते हुए उसे “शक्ति” स्वरूप माना गया है. जिसके बिना इस सृष्टि के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है. जो लोग यह मानते हैं कि यह सृष्टि “शक्ति” के बिना भी चल सकती है, उन्हें एक छोटी सी कहानी का संदर्भ देना चाहती हूं.

पौराणिक काल में, एक महान विद्वान साधु को अपने ज्ञान और उपलब्धियां का अधिकार हो गया था. और वे ऐसा मानने लगे थे की मुझे शक्ति की कोई आवश्यकता नहीं है. तो भगवान ने उनका अहंकार तोड़ने के लिए सोचा. भगवान ने एक शिकारी का रूप धारण किया और साधु के पास पहुंचे. भगवान ने उसे कहा कि मेरा हिरण कहीं खो गया है उसे ढूंढने में मेरी मदद करोगे? साधु ने सोचा इसमें कौन सी बड़ी बात है. वह तुरंत तैयार हो गया. थोड़ा आगे जाते ही उसे एक हिरन दिखाई दिया. साधु उसके पीछे दौड़ने लगा. दौड़ता रहा दौड़ता ही रहा. शाम हो गई पर साधु के हाथ में वह हिरन नहीं आया.

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साधु अपने आश्रम पहुंचा. भगवान वहां उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे. भगवान ने हिरण के बारे में पूछा, तो उसने अपनी असमर्थता व्यक्त की, और कहा क्षमा करिए, पूरा दिन दौड़ता रहा पर हिरण को पकड़ नहीं पाया. अब मुझ में “शक्ति” नहीं है.

भगवानने उसे कहा, जिस शक्ति को तुम मानते नहीं थे, आज उसी शक्ति की कमी का तुम्हें अहसास हो रहा हैं. जिस शक्ति से हम सभी को ऊर्जा प्राप्त होती है, उसके महत्व को पहचानो एवं अपने अभिमान को त्याग दो.

इस कहानी का तात्पर्य यह है की “शक्ति” का सम्मान और आदर करते हुए उसे अपने जीवन में तब तक आप स्वीकार नहीं करते जब तक आपका विकास संभव नहीं है. इसीलिए हमारी सभ्यता में उसे देवी शक्ति के रूप में पूजते हैं.

इस शक्ति के स्वरूप अलग-अलग है. देवी शक्ति है, सृष्टि शक्ति है, धरती शक्ति है, नदी शक्ति है, मातृभूमि शक्ति है, और माता भी शक्ति है, अर्थात नारी शक्ति स्वरुप है.

जब हम मातृभूमि को शक्ति मानते हैं, तब इसका अद्भुत वर्णन करते हुए बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी ने अजरावर कविता लिखी. “वंदे मातरम” जिसके 150 साल पूरे हो गए हैं. वह शक्ति ही थी जिसने लाखों नौजवानों को क्रांति की प्रेरणा दी. लाखों लोग “वंदे मातरम” कहते हुए स्वतंत्रता के यज्ञ में आहुति देते हुए वीरगति को प्राप्त हुए.

यह गीत भारत को एक देवी के रूप में प्रतिष्ठित करता है. जो पोषण करती है और शक्ति प्रदान करती है. इसमें माता को सुख और वरदान देने वाली कहां गया है. यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति का सबसे प्रमुख प्रतीक बना. ब्रिटिश शासन के दौरान देशवासियों के दिलों में गुलामी के खिलाफ आग भड़काने वाले सिर्फ दो शब्द से “वंदे मातरम”.

वंदे मातरम यह गीत शक्ति का स्रोत बना, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा. भारतीय संस्कृति में महिला दिवस केवल 24 घंटे का जश्न नहीं है. हमारी संस्कृति एवं सभ्यता में “स्त्री” और उसकी शक्तियों देवी स्वरूप माना गया हैं. जिसे हम “डिवाइन एनर्जी” कहते हैं. यह शक्ति किसी ना किसी रूप में अस्तित्व में है. जब यह शक्ति हमारे विचारों को और कार्य को गति देती है, तो उसका फल हमें जो मिलता है वह है “सिद्धि”. आज की भाषा में कहे तो “यश”, “सक्सेस”.

इस शक्ति का स्वीकार हमने किया और उसे हमने उतना ही उच्च स्थान दिया. उसको सम्मान दिया. जब-जब शक्ति की आवश्यकता निर्माण हुई तब तब शक्ति साकार रूप लेकर आई. कभी दुर्गा के रूप में, कभी चंडी के रूप में, तो कभी सरस्वती के रूप में. इन्ही शक्तियों ने इस सृष्टि का रक्षण किया. दुष्टों का संहार किया और पुनश्च: जीवन की शुरुआत हुई. हमारे पौराणिक ग्रंथों जो लिखा है उसके अनुसार देवताओं ने शक्ति ही आराधना की और समय काल के अनुसार शक्ति ने प्रकट होकर आशीर्वाद प्रदान किया.

सतयुग की बात करें, तो भगवान राम ने भी रावण के साथ युद्ध के पहले शक्ति की पूजा की. हिंदी के प्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने राम की शक्ति पूजा में भगवान राम ने किस तरह शक्ति की देवी की पूजा की उसका सुंदर वर्णन किया है. भगवान राम को उस महाशक्ति ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया, “होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन कह महाशक्ति राम के वादन में हुई लीन.

यह शक्ति जब सरस्वती बनकर आई, तो हमने देखा की नारी शक्ति ने ज्ञान के प्रकाश में और भी उज्ज्वलता पाई. रामायण में कैकई युद्ध प्रवण थी. महाभारत में द्रोपदी अग्नि से उत्पन्न हुई थी और वह विद्व्ता से परिपूर्ण थी. वैदिक काल में भी महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त था. उन्हें शाश्त्रार्थ और चर्चाओं में बराबरी का स्थान प्राप्त था. उन्हें सभी कार्यो में सहभाग लेने का पूर्ण स्वातन्त्र प्राप्त था.

काल बदलता गया, और कुछ ऐसे हालात, परिस्थितियों का निर्माण हुआ की  स्त्रियों के ऊपर प्रतिबद्ध लगने लगा. इसके कई कारण हो सकते हैं, उसमें से एक प्रमुख कारण सामने आता है, वह है हमारे भारतवर्ष पर आक्रांताओं का आतंक. आक्रांताओ द्वारा की जाने वाली बर्बरता एवं क्रूरता को देखते हुए हमारे पूर्वजों ने महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वाभिमान का ध्यान रखते हुए उनके ऊपर पर कुछ प्रतिबंध लगाना शुरू किया होगा. इतिहास का वह काला दौर था, जब हमारी स्त्रियों के साथ अत्याचार हुए.

लेकिन जब अमावस से ज्यादा विकट दिन एवं काली रातें थी, जब सभी ने उम्मीद छोड़ दी थी, तब एक और “शक्ति” ने नयी उमंगो से भरे प्रकाशमान सवेरे के रूप में दस्तक दी. जिसने स्वाभिमान जागृत करते हुए सोए हृदयों को नयी स्फूर्ति प्रदान की. नयी शक्ति जागृत हुई. उस शक्ति का नाम था “जीजा बाई”. हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना हेतु तेजस्वी पुत्र को दिशा दी. उनका मार्गदर्शन किया और छत्रपति शिवाजी महाराज को स्वराज्य की स्थापना हेतु प्रेरित किया.

हमारी संस्कृति ने कभी ऐसा अट्टाहास नहीं किया की स्त्री को ज्यादा महत्व देना है या पुरुषों को अधिक महत्व देना हैं. हमारी संस्कृति हमेशा यही मानती आ रही है की दोनों सामान हैं. दोनों एक दूसरे के पूरक है. दोनों ही समाज में समानता के अधिकारी हैं, और सृष्टि निर्माण के लिए दोनों ही आवश्यक हैं. इसीलिये “अर्ध नारी नटेश्वर” का स्वरुप हैं. शिव है तो शक्ति हैं. सीता है तो राम हैं. और राधा है तो कृष्ण है.

लेकिन इनमें से कोई एक जब यह समझने लगता है कि मैं ही समर्थ हूं, तब सारी समस्याओं का आरंभ होता है. दोनों के बीच तुलना, स्पर्धा और अहंकार इतना प्रबल हो जाता है कि रिश्तो में दरारें आना शुरू हो जाती है.

पश्चिम के विचारों में यह ज्यादा दिखता है. और इसीलिए वहा आज परिवार टूटते बिखरते दिख रहे हैं. इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे समाज में यह समस्या नहीं है. पश्चिम के विचारों का प्रभाव हमारे समाज पर भी हुआ है. हम हमारे मूल विचारों को संस्कारों को और मूल्यों को भूलते जा रहे हैं. जिसका परिणाम हमारे समाज पर गहरा पड़ा है.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हमें जागरूक करता है, हमें प्रेरणा देता है, अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ लड़ने के  लिए. स्त्रियों ने अपनी क्षमताओं को सिद्ध करते हुए आसमान को छू लिया है. और भी मंजिलें बाकी है. पर उड़ान भरते समय हमें बस यह याद रहे की जो शक्ति हमें प्राप्त हुई उसका सृजन करना कर्म है. उसका योग्य प्रकार से उपयोग करना कर्तव्य है. हमारे ग्रंथो में इसी के बारे में जो उल्लेख किया है उसको यहां बताना भी जरूरी है

‘स्त्री की प्रसन्नता में सब कुल प्रसन्न होता है’.  दूसरा श्लोक जो है उसमें “तेज से सुशोभित और उज्जवल मै शक्ति बनती हु” ऐसा लिखा गया है.  इसके पाश्चात्य “नारी राष्ट्र का  भविष्य है” उसके बाद “स्त्री समाज की कुशल वास्तुकार है” और  यह भी बताना जरूरी है की  “सभी देवताओं से उत्पन्न हुआ और तीनों लोकों में व्याप्त वह अतुल्य  तेज जब एकत्रित हुआ तब वह नारी बन.

 इन सारे विविध वर्णन से यह साबित होता है कि कैसे हमारी  संस्कृति और सभ्यता में नारी का स्थान था. कुछ दशकों  पहले जो  जो कुप्रथाएं हमारे समाज में थी उसका कुछ तो कारण रहा होगा. जिसकी वजह से स्त्रियों के साथ अन्याय  होता गया. लेकिन कुछ सामाजिक परिवर्तन आए और स्त्री एक बार फिर स्वतंत्र वातावरण में अपना जीवन जीने लगी. आज के आधुनिक समाज में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान है. परंतु पाश्चात्य संस्कृति और विचारों का प्रभाव युवा पीढ़ी पर हावी होता दिख रहा है. “मै ही सब कुछ हु”, “मुझे किसी की आवश्यकता नहीं” यह भाव किसी भी संबंध को निरंतरता नहीं देता.

 जब किसी  बात को आप ज्यादा खींचते हो तो वह टूट जाता है. Feminism ने पश्चात लोगों के घर बर्बाद हुए. और आज वे लोग हमारे फैमिली सिस्टम, हमारी संस्कृति के बारे में अभ्यास करते दिख रहे हैं. देवताओं का अतुल्य तेज नारी है. वह तेज माँ है ,वह तेज पत्नी  है , वह तेज बहन  है, सहचारिणी है, ज्ञान है, कर्तव्य है ,प्यार है, प्रेम है ,संवेदना है ,मीठा सा झरना  है, गीत है. स्त्री त्याग है, तपस्या, सेवा है. इसके बारे में जितना भी लिखा जाए उतना कम  है. बस अंत में इतना ही कह सकते हैं स्त्री बिना इस सृष्टि की कल्पना अधूरी है.

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