तमिलनाडु के सीएम स्टालिन बोले- ‘तमिलनाडु में हिन्दी के लिए न कभी जगह थी और न होगी’
चेन्नई, 25 जनवरी। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के अध्यक्ष एवं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने अतीत में हिन्दी-विरोधी आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले राज्य के ‘भाषा शहीदों’ की रविवार को सराहना करते हुए कहा कि यहां हिन्दी के लिए न कभी कोई जगह थी और न होगी।
सीएम स्टालिन ने ‘भाषा शहीद दिवस’ के अवसर पर कहा, ‘राज्य ने अपनी भाषा से अपने जीवन की तरह प्रेम किया, उसने हिन्दी थोपे जाने के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष किया और जब-जब इसे थोपा गया, तब-तब उसी तीव्रता से इसका विरोध किया गया।’
द्रमुक प्रमुख ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, ‘भाषा शहीद दिवस- तमिलनाडु में हिन्दी के लिए न तब कोई जगह थी, न अब है और न कभी रहेगी।’ उन्होंने 1965 में चरम पर पहुंचे हिन्दी-विरोधी आंदोलन से जुड़े इतिहास का एक संक्षिप्त वीडियो साझा किया। वीडियो में ‘शहीदों’ के साथ-साथ भाषा मुद्दे पर दिवंगत द्रमुक नेताओं सी. एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि के योगदान का भी उल्लेख किया गया।
வீரவணக்கம், வீரவணக்கம்! மொழிப்போர்த் தியாகிகளுக்கு வீரவணக்கம்!
1938-ஆம் ஆண்டு மொழிப்போர்க் களத்தின் முதற்கட்டத்தில் உயிர்த்தியாகம் செய்த நடராசன் – தாளமுத்து ஆகியோருக்கு மூலக்கொத்தளத்தில் அமைந்துள்ள அவர்களது நினைவிடத்தில் வீரவணக்கம் செலுத்தினேன். மொழிப்போர் வீராங்கனை அன்னை… pic.twitter.com/LO9weBKFIt
— M.K.Stalin – தமிழ்நாட்டை தலைகுனிய விடமாட்டேன் (@mkstalin) January 25, 2026
‘तमिल के लिए हमारा प्रेम कभी नहीं मरेगा, हम हिन्दी थोपे जाने का हमेशा विरोध करेंगे’
स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने हिन्दी-विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर ‘उपमहाद्वीप में विभिन्न भाषाई राष्ट्रीय समूहों के अधिकार और पहचान की रक्षा की।’ उन्होंने कहा, ‘मैं उन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, जिन्होंने तमिल भाषा के लिए अपने अनमोल प्राण दिए। भाषा युद्ध में अब और कोई जान नहीं जाएगी, तमिल के लिए हमारा प्रेम कभी नहीं मरेगा। हम हिन्दी थोपे जाने का हमेशा विरोध करेंगे।’
उल्लेखनीय है कि ‘भाषा शहीद’ शब्द उन लोगों को संदर्भित करता है, जिन्होंने 1964-65 में तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी आंदोलन के दौरान अपनी जान दी थी। इनमें से अधिकतर ने आत्मदाह किया था। यह दक्षिणी राज्य आज भी दो भाषा सूत्र-तमिल और अंग्रेजी-का पालन करता है। द्रमुक भी केंद्र पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के जरिए हिन्दी थोपे जाने का आरोप लगाती रही है।
