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महत्वपूर्ण कहानियांहिन्दी

स्वामी दयानंद सरस्वतीजी ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा पर बल देते हुए ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश दिया

Vinayak Barot
Last updated: March 5, 2024 1:33 pm
Vinayak Barot
Published: March 5, 2024
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स्वामी दयानंद का जन्म 12 फरवरी 1824 (फाल्गुन कृष्ण दशमी,1824) को गुजरात के टंकारा में हुआ था। इनका बचपन का नाम मूलशंकर था। परिवार सम्पन्न एवं प्रभावशाली था और पिता के मार्गदर्शन में मूलशंकर ने नीतिशास्त्र, साहित्य एवं व्याकरण का अध्ययन किया। उन्होंने 14 वर्ष की आयु में ही सम्पूर्ण यजुर्वेद संहिता को कंठस्थ कर लिया था।

बचपन में ही मूलशंकर की बहन और चाचा का निधन हो गया, जिसके चलते उनका मन गहरे संताप में डूब गया। इसके उपरांत, जीवन और मृत्यु के जटिल प्रश्नों को समझने के लिए उनके मन में जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी। साथ ही, उन्हें सांसारिक कार्यों से भी विरक्ति होने लगी। उनकी इस मनःस्थिति को देखकर पिता चिंतित रहने लगे और उन्होंने सोचा कि क्यों न मूलशंकर का विवाह कर दिया जाये, जिससे वह सांसारिक कार्यों में पुनः रूचि लेने लगेंगे। मगर मूलशंकर इन सब में बंधने को तैयार नहीं थे। अतः उनके पिता द्वारा निश्चित की गई विवाह की तिथि से कुछ दिन पूर्व ही वह घर त्यागकर ज्ञान की खोज में निकल पड़े और साधु बन गये।

वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए वह गुरु की खोज करने लगे, स्वामी विरजानंद के सानिध्य में पहुंचे। जहां उन्हे अनुभव हुआ कि जिस गुरु की वे खोज कर रहे हैं, वह उन्हें मिल गये हैं। यहाँ उन्हे नया नाम – दयानंद सरस्वती दिया गया।

स्वामी विरजानंद के शिष्यत्व में उनके ज्ञान का परिमार्जन हुआ। दयानंद समाज के उत्थान में वेदों के ज्ञान को आधार मानतें थें। उन्होंने वेदों के प्रचार के लिए देशव्यापी अभियान चलाया। समाज उत्थान और राष्ट्र प्रगति के उद्देश्य से 1875 को बंबई में दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की।

आर्य समाज के माध्यम से उन्होंने समाज में प्रचलित अंधविश्वासों एवं रुढियों का विरोध किया। साथ ही उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा पर बल देते हुए ‘वेदों की ओर लौटने’ का संदेश दिया। इसके अलावा, स्वामी जी ने वेदों को हिन्दू धर्म का मूल स्रोत माना और वैदिक मान्यता के अनुसार हिन्दू धर्म की उदार व्याख्या प्रस्तुत की।

30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के अवसर पर जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने महर्षि दयानंद को अपने महल में आमंत्रित किया और गुरु का आशीर्वाद मांगा। दयानंद ने जब राजा को दरबार की नृत्यांगना का परित्याग करने और धर्म के जीवन पाठ पर आगे बढ़ने की सलाह दी तो इससे नृत्यांगना दयानंद पर क्रुद्ध हो गयी। उसने रसोइए के साथ महर्षि के दूध में कांच के टुकड़े मिलाने का षड्यंत्र रचा जिससे महर्षि को कष्टदायी पीड़ा के साथ मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा। हालांकि, उन्होंने दीपावाली के दिन अजमेर में अपनी मृत्यु होने से पूर्व इस षड्यंत्र में सम्मिलित रसोइए को क्षमा कर दिया।

आज आर्य समाज भारत ही नहीं बल्कि विश्‍व के अन्य भागों में भी पर्याप्त रूप से सक्रिय है। संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, त्रिनिदाद, मेक्सिको, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड, केन्या, तंजानिया, युगांडा, दक्षिण अफ्रीका, मलावी, मॉरीशस, पाकिस्तान, बर्मा, थाईलैंड, सिंगापुर, हांगकांग और ऑस्ट्रेलिया कुछ ऐसे देश हैं जहां आर्य समाज की शाखाएं हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती – विभिन्न विद्वानों के कथन

  • एनी बेसेंट ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया ए नेंशन’ में लिखा है – “स्वामी दयानंद जी ने सर्वप्रथम घोषणा की थी कि भारत भारतीयों के लिए है।“
  • श्रीमती एनीबीसेंट ने कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में कहा था –“जब स्वराज मंदिर बनेगा तो उस में बड़े-बड़े नेताओं कि मूर्तियां होंगी और सबसे ऊँची मूर्ति दयानंद की होगी।“
  • वीर सावरकर – “महर्षि दयानंद स्वाधीनता संग्राम के सर्वप्रथम योद्धा, हिन्दू जाति के रक्षक थे।“
  • सरदार पटेल – “स्वामी दयानंद जी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने देश को किंकर्तव्यविमूढ़ता के गहरे गड्ढ़े में गिर जाने से बचाया। उन्होंने भारत की स्वाधीनता की वास्तविक नींव डाली थी।“
  • डॉ. राधाकृष्णन – “महर्षि दयानंद ने राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक उद्धार का बीड़ा उठाया…स्वामी जी ने स्वराज का जो सबसे पहला संदेश हमें दिया था, उसकी आज हमें रक्षा करनी है” ।
  • इन्दिरा गांधी – “हमारे देश ने बहुत-से महान पुरुषों और सुधारकों को जन्म दिया, इनमें महर्षि दयानंद हैं। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज में फैले अंधविश्वास को और विशेष रूप से ऊँच-नीच के भेदभाव को मिटाने में लगाया”।
  • जगजीवनराम – “आर्य समाज का समाज सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान है। महर्षि दयानंद के सिद्धांतों, आदर्शों और उपदेशों का प्रचार आर्यसमाज द्वारा किया जाता है, इससे जनता में समानता पर आधारित जाति-पांति विहीन समाजवादी समाज के निर्माण की भावना उद्बोधित होने में सहायता मिलती है” ।
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी – “ऐसे समय में जब हमारी परम्पराएँ और आध्यात्मिकता लुप्त हो रही थीं, तब स्वामी दयानंद ने ‘वेदों की ओर लौटने’ का आह्वान किया । महर्षि दयानंद केवल वैदिक ऋषि ही नहीं बल्कि राष्ट्र ऋषि भी थे” ।

स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रमुख रचनाएँ

  1. सत्यार्थप्रकाश
  2. संस्कृत वाक्य प्रबोध
  3. ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका
  4. व्यवहारभानु
  5. यजुर्वेदभाष्य

आर्य–समाज की स्थापना

स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 को मुंबई में आर्य समाज की स्थापना की। यह एक समाज सुधार आंदोलन था, जिसका अर्थ है ‘सज्जनों का समाज’। आर्य समाज के दस सिद्धांत इस प्रकार हैं –

  • सभी शक्ति और ज्ञान का प्रारंभिक कारण ईश्वर है।
  • ईश्वर ही सर्व सत्य है, सर्व व्याप्त है, पवित्र है, सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है और सृष्टि का कारण है। केवल उसी की पूजा होनी चाहिए।
  • वेद ही सच्चे ज्ञान ग्रंथ हैं। इसलिए वेदों को पढ़ना और दूसरों को सुनाना सभी आर्य का परम धर्म है।
  • सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए।
  • उचित-अनुचित के विचार के बाद ही कार्य करना चाहिए।
  • मनुष्य मात्र को शारीरिक, सामाजिक और आत्मिक उन्नति के लिए कार्य करना चाहिए।
  • प्रत्येक के प्रति न्याय, प्रेम और उसकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।
  • ज्ञान की ज्योति फैलाकर अंधकार को दूर करना चाहिए।
  • केवल अपनी उन्नति से संतुष्ट न होकर दूसरों की उन्नति के लिए भी यत्न करना चाहिए।
  • समाज के कल्याण और समाज की उन्नति के लिए अपने मत तथा व्यक्तिगत बातों को त्याग देना चाहिए।

स्वामी दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना करके एक प्रकार से धर्म प्रचारक संघ की नींव रखी थी। यह संघ आडम्बर से अछूता और समाज सुधार का पोषक था। इसकी स्थापना के माध्यम से स्वामी जी ने मानवमात्र में नूतन जीवन एवं जागृति उत्पन्न करने का अमोघ साधन प्रस्तुत किया। उनके द्वारा गठित इस समाज द्वारा वैदिक धर्म की मर्यादा और उसकी गौरव गरिमा अक्षुण्ण बनी।

स्वामी दयानंद जी का कथन जिसमें कहा गया था कि ‘आर्य समाज रूपी वाटिकाएँ हरी भरी, फूली फली लहलहाती दिखाई देंगी। प्रभु कृपा से यह सब कुछ होगा परंतु मैं न देख सकूंगा’, सर्वथा सत्य सिद्ध हुआ है। आज आर्य समाज के सामने अनेक कार्य हैं। उनके कार्यों में सबसे बड़ा कार्य वैदिक विचारधारा एवं वैदिक संस्कृति का अधिकाधिक प्रचार और प्रसार करना, विरोधी तत्वों का उपशमन कर वैदिक धर्म का मार्ग प्रशस्त्र करना और जड़वाद की विभीषिका से मानव मात्र की रक्षा कर संसार को विनाश के गर्त से बचाना है। आर्य समाज ने समाज में आई विकृतियों को दूर कर भारतीय जनमानस को एकजुट करने का कार्य किया।

आर्य समाज पर अन्यायपूर्ण प्रतिबंध और कट्टरपंथियों के हमलें

कई स्थानों विशेषकर मस्जिदों के सामने आर्य समाज के नगर-कीर्तनों पर ब्रिटिश सरकार ने पाबंदी लगाई हुई थी। साल 1926 में मुरादाबाद और 1930 में पानीपत में  इस प्रकार की अन्यायपूर्ण पाबंदियाँ थोपी गई थी।

22 नवंबर 1930 को सहारनपुर के बहादुराबाद में आर्य समाज मंदिर में एक ब्रिटिश अफसर ने जूते पहने कुछ सिपाहियों के साथ जबरदस्ती घुसकर वेदी का अपमान किया और ॐ ध्वज को फाड़ डाला।

ब्रिटिश कालखंड में राजनैतिक और धार्मिक आंदोलनों में जेल गए आर्य सत्याग्रहियों के लिए कारावास में हवन पर प्रतिबंध लगाया हुआ था।

23 दिसंबर 1926 को स्वामी श्रद्धानंद की दिन के चार बजे दिल्ली में अब्दुल रशीद नाम के एक उन्मादी ने हत्या कर दी।

1927-1942 के बीच मुस्लिम षड्यंत्रों के चलते लाहौर में माननीय राजपाल की हत्या और उसके बाद लाहौर में दो अन्य आर्य बंधुओं की हत्या, 1934 में बहराइच के साहू बद्रीशाह की हत्या, कराची के आर्य नेता पंडित नाथुराम की हत्या मुस्लिम कट्टरपंथियों ने की। अतः आत्मरक्षा के लिए आर्य वीर दल और आर्य रक्षा समिति का गठन किया गया।

हिसार जिले की लौहरु रियासत का शासक एक मुस्लिम था जबकि जनता अधिकांश हिन्दू। साल 1936 और 1940 में दो बार मुस्लिम कट्टरपंथियों ने आर्य समाज के नगर-कीर्तनों पर हमला किया।

सिंध की मुस्लिम लीग सरकार ने 26 अक्टूबर 1944 को सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया।

प्रगतिशील कार्य और विचार

  • स्वामी दयानंद के समय समाज आडम्बरों और विकृतियों से घिरा हुआ था। एक तरफ ब्रिटिश काल की पराधीनता से संघर्ष चल रहा था तो दूसरी ओर समाज को व्यापक सुधार की आवश्यकता थी। स्वामी जी ने सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों का विरोध किया एवं समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर किया। अपने इस उद्देश्य के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।
  • वैदिक और बौद्धकाल तक भारतीय महिलाओं में पर्दे की प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता। मुगलकाल में पर्दे की प्रथा का चलन हुआ जिसके परिणामस्वरूप महिलायें धीरे-धीरे घर की चार दिवारी में सीमित हो गई। स्वामी जी ने इस समस्या की ओर ध्यान दिया। इसके लिए उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम एवं समारोहों में महिलाओं की भागीदारी पर बल दिया। स्वामी जी के प्रयत्नों से धीरे-धीरे पर्दे की प्रथा से भी स्त्रियों को मुक्ति मिलने लगी।
  • ‘पर्दा प्रथा’ की भाँति ही सती प्रथा के विरुद्ध भी स्वामी दयानंद सरस्वती ने आवाज उठाई। उन्होंने विधवा महिलाओं के जीवन मे प्रकाश की ज्योति जलाई। इसके लिए उन्होंने पुनर्विवाह की व्यवस्था की जिससे विधवा महिलाओं को नवजीवन मिला।
  • स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘बाल विवाह’ के विरुद्ध भी अभियान चलाया, जिससे समाज को इस कुरीति से मुक्ति मिल सके। सेन्ट्रल असेम्बली में राजस्थान के प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता दीवान बहादुर हरविलास जी शारदा ने तो इसके लिए कानून भी बनवाया था। स्वामी दयानंद का मानना था कि ‘बाल्यावस्था में विवाह से जितनी हानि पुरुष की होती है उससे अधिक महिला की होती है। जैसे कच्चे खेत को काट लेने से अन्न नष्ट हो जाता है, ठीक उसी तरह छोटी आयु में जो अपनी संतानों का विवाह कर देते हैं उनका वंश बिगड़ जाता है’।
  • स्वामी दयानंद सरस्वती में ‘बहुविवाह’ का भी विरोध किया और एक विवाह के आदर्श सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

स्त्री शिक्षा पर बल

स्वामी दयानंद सरस्वती, महिलाओं को शिक्षित करने के प्रबल पक्षधर थे। वैदिक काल में स्त्रियों का स्थान बहुत सम्मानजनक था और उन्हें भी शिक्षा का पूर्ण अधिकार था। हिन्दू धर्म में कोई भी यज्ञ स्त्रियों के बिना पूर्ण नहीं माना जाता था। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में देवताओं के साथ-साथ देवियों का भी उल्लेख मिलता है, जिन्होंने समय-समय पर अपने ज्ञान और शक्ति का परिचय दिया है। बाद में स्त्रियों को बाहर जाने एवं पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे स्त्रियों की स्थिति बदल गई। स्वामी जी ने स्त्रियों को शिक्षा के समान अवसर देने की बात कही। वे स्त्रियों को पुरुषों की भांति सक्षम बनाने के पक्षधर थे। स्वामी दयानंद का मानना है कि वेदाभ्यास एवं शिक्षा द्वारा ही स्त्रियाँ गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियां बन समाज को प्रगति के पथ पर ले जा सकती हैं।

‘शुद्धि आंदोलन’ और ‘घर वापसी’ का कार्य

इस्लाम और ईसाइ धर्म मे मतांतरित हिंदुओं का अपने मूल धर्म और समाज मे वापस आने की प्रक्रिया ‘घर वापसी’ के नाम से जानी जाती है। इसी प्रक्रिया को शुद्धि भी कहा जाता है। भारत में रहने वाले अधिकांश मुस्लिमों और ईसाइयों के पूर्वज हिन्दू ही थे। किसी समय भय या धोखे से उन्हें मतांतरित किया गया था। स्वामी दयानंद सरस्वती ने समाज के इस वर्ग की घर वापसी का कदम उठाया और इसके लिए उन्होंने ‘शुद्धि आंदोलन’ चलाया। शुद्धि आंदोलन से समाज को एकजुट करने में व्यापक बल मिला।

स्वाधीनता आंदोलन में योगदान

  • इतिहासकार जदुनाथ सरकार के अनुसार स्वामी जी ने ‘स्वराज’ की प्राप्ति की मांग काँग्रेस के गठन से दशकों पहले की थी। स्वामी जी ने अपनी एक प्रार्थना में लिखा, “हे कृपासिंधहो भगवन.. हमारा स्वराज्य अत्यंत बढ़े।“
  • दादा भाई नरोजी ने भी स्वामी जी के लिए कहा था कि “मैंने स्वराज्य शब्द सर्वप्रथम महर्षि दयानंद के ग्रंथों से सीखा।“
  • स्वामी दयानंद ने स्वदेश प्रेम और स्वराज्य की भावना जागृत करके भारत की जनता को विदेशी शासन से मुक्त होने की प्रेरणा दी।
  • इन्होंने अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थप्रकाश’ में देश का गौरव गान किया और भारतवासियों के मन में अपने देश एवं धर्म के प्रति स्वाभिमान की भावना जगाई।
  • श्यामजी कृष्ण वर्मा, गोविंद रानाडे, मदनलाल ढींगरा, लाला हरदयाल, अजीत सिंह, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द जैसे क्रांतिकारी स्वामी जी को अपना गुरु मानते थे।
  • स्वामी दयानंद जी की शिक्षा का प्रभाव महात्मा गांधी, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी, वीर सावरकर, भीकाजी कामा, राम प्रसाद बिस्मिल, महादेव गोविंद रानाडे, और सुभाष चंद्र बोस के जीवन एवं चिंतन में स्पष्ट दिखाई देता है।
  • महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह की शिक्षा आर्य समाज द्वारा संचालित लाहौर के डी.ए.वी. स्कूल में ही हुई थी।

संदर्भ

  1. आर्य, कृष्ण सिंह, स्वामी दयानंद सरस्वती: उनके जीवन और कार्य का अध्ययन,: मनोहर, १९८७, दिल्ली
  2. अर्जन सिंह, दयानंद सरस्वती: आर्य समाज के संस्थापक: ईएसएस ईएसएस प्रकाशन, 1979 नई दिल्ली
  3. दयानंद सरस्वती की आत्मकथा, मनोहर प्रकाशन , 1978, नई दिल्ली।
  4. जोर्डेंस, जे टी एफ, दयानंद सरस्वती, उनके जीवन और विचार, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1978, दिल्ली
  5. लाजपत राय, लाला, स्वामी दयानंद सरस्वती: उनकी जीवनी और शिक्षाएं, नई दिल्ली: रिलायंस पब्लिशिंग. हाउस; दिल्ली , एप्ट बुक्स, न्यूयॉर्क 1991 द्वारा वितरित
  6. पांडेय, धनपति, स्वामी दयानंद सरस्वती, प्रकाशन प्रभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 1985, नई दिल्ली
  7. प्रेमलता, स्वामी दयानंद सरस्वती, सुमित प्रकाशन, 1990, नई दिल्ली
  8. स्मारिका, अन्तर्राष्ट्रीय आर्य समाज स्थापना शताब्दी समारोह, नई दिल्ली

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